Allahabad High Court : अपराधियों को शैक्षिक संस्थानों के संचालन की अनुमति नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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अमृत विचार, प्रयागराज । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शैक्षिक संस्थानों के संचालन से संबंधित मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षा किसी राष्ट्र की ताकत और चरित्र की रीढ़ होती है, इसलिए एक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को शैक्षिक संस्थान को चलाने और देश के युवाओं की शिक्षा की संभावनाओं को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति अजय भनोट की एकलपीठ ने हत्या के दोषी द्वारा दाखिल याचिका को खारिज करते हुए दिया।

अदालत ने कहा कि क़ानून उस स्थिति को बर्दाश्त नहीं कर सकता है, जिसमें सजायाफ्ता अपराधी अपने अधिकार के तौर पर शैक्षणिक संस्थान चलाते हैं। याची ने डिप्टी रजिस्टर, फर्म और सोसायटी द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसमें डिप्टी रजिस्ट्रार ने याची की संस्था 'शिक्षा प्रसार बनकटु बुजुर्ग इटावा' को इस आधार पर पंजीकृत करने से मना कर दिया गया था कि याची एक हत्या के मामले में दोषी पाया गया है। कार्यवाही के दौरान इस मामले में एक नया विपक्षी जोड़ा गया,जिसने याचिका का विरोध करते हुए याची के आरोपों की पुष्टि की। अदालत ने कहा कि याची और नए पक्षकार दोनों को अलग-अलग मामलों में हत्या का दोषी ठहराया गया था। हांलाकि उन्होंने पहली बार में अदालत के सामने इस तथ्य का खुलासा नहीं किया था। अदालत ने कहा कि ये तथ्य तब सामने आए, जब विरोधियों ने एक-दूसरे की दोषसिद्धि की ओर इशारा किया।

इसके अलावा अदालत ने पाया कि सोसायटी के सचिव के रूप में नियुक्त किए जाने के याची के अधिकार को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 की धारा 16ए के आलोक में देखा जाना चाहिए। उक्त धारा किसी शैक्षिक संस्थान के गठन, प्रबंधन और संचालन के लिए नैतिक अधमता से जुड़े अपराधी को अयोग्य घोषित करती है। इसे आपराधिक तत्वों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों को शुद्ध करने के लिए लागू किया जाना चाहिए, साथ ही रचनात्मक शक्तियों पर आपराधिक प्रभाव के अभिशाप को हटाये जाने के लिए भी यह आवश्यक है। अंत में कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में घुसपैठ करने वाले आपराधिक तत्वों के खतरे को रोकने के लिए यूपी सरकार के अपर मुख्य सचिव, संस्थागत वित्त, यूपी सरकार को कई दिशा निर्देश जारी किए, साथ ही याची तथा विपक्षी को पहली बार में अदालत के सामने अपने अपराधों का खुलासा न करने के लिए एक लाख का जुर्माना लगाया।

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