शिकायतकर्ता की सहमति के बिना भी एनआई एक्ट के तहत कार्यवाही रद्द करना संभव : HC
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एनआई एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही के संबंध में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कहा कि एक मजिस्ट्रेट नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के तहत आरोपी के खिलाफ कार्यवाही को समाप्त कर सकता है। अगर आरोपी अदालत के आदेशानुसार शिकायतकर्ता को उचित और स्वीकार्य मुआवजा देने के लिए तैयार हो जाता है।
उक्त मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ज्योत्सना शर्मा की एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत आरोपी के खिलाफ शिकायतकर्ता की सहमति के बिना भी मामले को उस स्थिति में समाप्त किया जा सकता है, जब न्यायालय इस संबंध में आश्वस्त हो कि शिकायतकर्ता को विधिवत मुआवजा दिया गया है। मामले के अनुसार पुनरीक्षणकर्ता (रानी गौर) द्वारा अगस्त 2009 में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत आरोपी के खिलाफ थाना परतापुर, मेरठ में शिकायत दर्ज की गई थी। विचारण न्यायालय के समक्ष मामला अभी भी विचाराधीन है।
कार्यवाही के दौरान आरोपी ने 11 लाख रुपए का डिमांड ड्राफ्ट दाखिल कर शिकायतकर्ता को केस कंपाउंड करने का निर्देश देने की प्रार्थना की। पुनरीक्षणवादी ने कंपाउंडिंग पर आपत्ति जताते हुए कहा कि 13 साल के अंतराल के बाद 11 लाख रुपए में मामले को नहीं निपटाया जा सकता है। संबंधित मजिस्ट्रेट ने आरोपी के आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि शिकायतकर्ता को मामले की कंपाउंडिंग के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। इसके बाद अभियुक्त ने उपरोक्त आदेश को सत्र न्यायाधीश, मेरठ के सामने पुनरीक्षण दाखिल कर चुनौती दी। सुनवाई के दौरान सत्र न्यायाधीश ने उक्त आदेश को रद्द करते हुए विचारण न्यायालय को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार एक उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया। सत्र न्यायालय के इस आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षणकर्ता ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की और तर्क दिया कि 14 साल के बाद चेक की राशि लगभग 10% अतिरिक्त देकर मामले को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है, जो उसे स्वीकार्य नहीं है।
इस पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के आलोक में कहा कि कुछ परिस्थितियों में शिकायतकर्ता की सहमति के बिना भी मामले का निपटारा किया जा सकता है। ऐसे मामलों में सीआरपीसी की धारा 258 के प्रावधानों के अनुसार मजिस्ट्रेट अपने विवेकाधिकार को लागू करने के लिए सशक्त है। वह शिकायतकर्ता की सीधे सहमति के बिना भी आरोपी के खिलाफ कार्यवाही बंद कर सकता है। हालांकि इस दौरान मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता की आपत्तियों को भी ध्यान में रखना होता है। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर अंत में कोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
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