किसान हित में बड़ा फैसला

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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ऐसे समय में जब खुदरा महंगाई दर में गिरावट का रुख है, केंद्र सरकार ने धान, मक्का और मूंगफली समेत कई फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी कर किसानों के हित में एक बड़ा फैसला लिया है। इससे देश में बड़े स्तर पर किसानों को लाभ होगा और नई फसल के लिए अच्छे दाम मिल पाएंगे।

फसल वर्ष 2023-23 के लिए मूंग का एमएसपी 10.4 प्रतिशत बढ़कर 8,558 रुपये प्रति क्विंटल हो गया, जबकि पिछले वर्ष यह 7,755 रुपये प्रति क्विंटल था। खरीफ फसलों की एमएसपी में यह बढ़ोतरी वित्त वर्ष 2023-24 के लिए की गई है। उल्लेखनीय है कि कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय की जाती है।

कहा जा सकता है कि सरकार ने खेती की बढ़ती हुई लागत को देखते हुए किसानों के हित में ये फैसला लिया है। मंत्रिमंडल की बैठक में लिए गए फैसले के मुताबिक तुअर दाल की एमएसपी में 400 रुपये प्रति क्विटल की बढ़ोतरी की गई है, जबकि उड़द दाल की एमएसपी को 350 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाकर 6,950 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है।

वहीं, मक्के की एमएसपी के बहाने 128 रुपये प्रति क्विंटल की मंजूरी दी है। पिछले कुछ वर्षों की तुलना में इस साल खरीफ की फसलों के लिए एमएसपी में की गई बढ़ोतरी सबसे ज्यादा है। केंद्र सरकार के पिछले नौ सालों को देखें तो इस दौरान मोटे अनाजों के मामले में एमएसपी सबसे तेज गति से बढ़ी है। खरीफ फसलों के एमएसपी में 100 फीसदी तक की बढ़ोतरी की गई है।

दरअसल धान मुख्य खरीफ फसल है, जिसकी बुवाई सामान्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत के साथ शुरू होती है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अल नीनो की स्थिति के बावजूद जून-सितंबर की अवधि के लिए सामान्य मानसून का अनुमान लगाया है। चक्रवाती तूफान ‘बिपोरजॉय’ तेजी से गंभीर चक्रवाती तूफान में तब्दील हो गया है।

इससे केरल में मानसून की धीमी शुरुआत होने और उसके दक्षिणी प्रायद्वीप के आगे कमजोर प्रगति करने का पूर्वानुमान है। मानसून एक जून को तय समय पर केरल नहीं पहुंच सका है। ऐसे में एमएसपी में बढ़ोतरी से किसानों को फसल के तहत अधिक क्षेत्र लाने और अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकेगा।

विगत कुछ वर्षों में एमएसपी को तिलहन, दलहन और मोटे अनाजों के पक्ष में पुनर्संगठित करने के लिए ठोस प्रयास किए गए थे जिससे उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी एवं कृषि प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके और मांग-आपूर्ति असंतुलन को ठीक किया जा सके।