नाम वापसी का ‘तमाशा’ पाठ्यक्रम को अद्यतन करने की प्रक्रिया को बाधित कर रहा: शिक्षाविद
नई दिल्ली। केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (एनआईटी) के निदेशकों और भारतीय प्रबंधन संस्थानों के (आईआईएम) के अध्यक्षों समेत शिक्षाविदों के एक समूह ने आरोप लगाया है कि एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों संबंधी विवाद के बीच कुछ ‘‘घमंडी एवं स्वार्थी’’ लोगों द्वारा अपना नाम वापस लेने की मांग उठाकर किया गया ‘‘तमाशा’’ पाठ्यक्रम को अद्यतन करने की प्रक्रिया को बाधित कर रहा है।
राजनीति शास्त्र के विशेषज्ञों सुहास पालसीकर और योगेन्द्र यादव द्वारा पुस्तकों से मुख्य सलाहकार के रूप में उनका नाम हटाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) को पत्र लिखे जाने के कुछ ही दिनों बाद 33 अन्य शिक्षाविद ने परिषद से पाठ्यपुस्तकों से अपना नाम हटाने की मांग करते हुए कहा है कि उनका सामूहिक रचनात्मक प्रयास खतरे में है।
इसके बाद, 73 शिक्षाविदों ने बृहस्पतिवार रात को जारी एक संयुक्त बयान में आरोप लगाया कि एनसीईआरटी को बदनाम करने की पिछले तीन महीने से जानबूझकर कोशिश की जा रही है और यह ‘‘शिक्षाविदों के बौद्धिक अहंकार को दर्शाता है जो चाहते हैं कि छात्र 17 साल पुरानी पाठ्यपुस्तकों को ही पढ़ते रहें।’’
इस संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), तेजपुर विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, रांची विश्वविद्यालय, बेंगलुरू विश्वविद्यालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के कुलपति, एनआईटी जालंधर के निदेशक, आईआईएम काशीपुर के शासक मंडल के अध्यक्ष, आईसीएसएसआर (भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद) के सचिव और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) के अध्यक्ष शामिल हैं।
बयान में कहा गया है, ‘‘ प्रमुख सरकारी संस्थान एनसीईआरटी को बदनाम करने और पाठ्यक्रम अद्यतन करने के लिए अत्यावश्यक प्रक्रिया को बाधित करने की पिछले तीन महीने से जानबूझकर कोशिश की जा रही हैं।’’ इसमें कहा गया है, ‘‘इस नाम-वापसी के तमाशे के जरिए मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करने वाले शिक्षाविद यह भूल गए हैं कि पाठ्यपुस्तकें सामूहिक बौद्धिक विचार-विमर्श और कड़े प्रयासों का परिणाम हैं।’’
बयान में कहा गया है कि जिन विद्वानों ने पाठ्यपुस्तकों में बदलाव का सुझाव दिया है, उन्होंने समकालीन ज्ञान की आवश्यकता के अनुसार पाठ्यक्रम सामग्री को केवल युक्तिसंगत बनाने की सलाह दी है। इसमें कहा गया है, ‘‘जहां तक इसकी बात है कि क्या अस्वीकार्य है और क्या वांछनीय है, इसका फैसला कौन करता है, तो यह तर्क दिया गया है कि हर नयी पीढ़ी को मौजूदा ज्ञान के आधार में कुछ जोड़ने या कुछ हटाने का अधिकार है।’’
बहरहाल, एनसीईआरटी ने कहा है कि किसी का नाम वापस लिए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि स्कूल के स्तर पर पाठ्यपुस्तकों को उस विषय के ज्ञान एवं समझ के आधार पर विकसित किया जाता है और किसी भी स्तर पर कोई एक व्यक्ति इसके लेखन का दावा नहीं कर सकता। संयुक्त बयान में कहा गया है, ‘‘गलत सूचनाओं, अफवाहों और झूठे आरोपों के जरिए वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) के कार्यान्वयन को पटरी से उतारना चाहते हैं और एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों के अद्यतन की प्रक्रिया को बाधित करना चाहते हैं। उनकी मांग है कि छात्र समकालीन विकास और शैक्षणिक प्रगति के अनुरूप अद्यतन पाठ्यपुस्तकों के बजाय 17 साल पुरानी पाठ्यपुस्तकों से पढ़ना जारी रखें। उनकी यह मांग बौद्धिक अहंकार को दर्शाती है।’’
इसमें कहा गया है, ‘‘अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने की चाहत में वे देश भर के करोड़ों बच्चों के भविष्य को खतरे में डालने के लिए तैयार हैं। छात्र अद्यतन पाठ्यपुस्तकों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जबकि ये शिक्षाविद् लगातार बाधाएं पैदा कर रहे हैं और पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार रहे हैं।’’
एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से कई विषयों और अंशों को हटाने से पिछले महीने यह विवाद शुरू हुआ था। विवाद के मूल में अहम तथ्य यह है कि तर्कसंगत बनाने की कवायद के तहत किये गये परिवर्तनों को अधिसूचित किया गया था, लेकिन विवादास्पद रूप से हटाई गई कुछ सामग्री का उल्लेख नहीं किया गया था।
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