ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी डेन के वितरक की गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक

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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साजिश और धोखाधड़ी के आरोप में ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी डेन के वितरक हरजिंदर सिंह और उनके बेटे की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है और राज्य सरकार से छह सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। यह आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने हरजिंदर सिंह और एक अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

मामले के तथ्यों के अनुसार याचीगण के विरुद्ध आईपीसी की विभिन्न धाराओं, सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 की धारा 65 और 72 के साथ-साथ भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा 25 के अंतर्गत पुलिस स्टेशन इज्जतनगर, जिला बरेली में प्राथमिक दर्ज की गई थी। उक्त प्राथमिक में याचीगण के खिलाफ यह आरोप लगाया गया है कि शिकायतकर्ता की कंपनी डेन के नाम से फिक्स्ड लाइन ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाओं के व्यवसाय में है।

याची और उसका बेटा उक्त कंपनी का वितरक है। शिकायतकर्ता की कंपनी और याची जो सिमरन एजेंसि के नाम और स्टाइल में एक प्रोपराइटरशिप फर्म चला रहा था, के बीच 9.5.2022 को एक डिस्ट्रीब्यूटरशिप समझौता निष्पादित किया गया था।अधिवक्ता ने आगे कहा कि शिकायतकर्ता की कंपनी ने गुप्त तरीके से जीओ कंपनी को 67% शेयर बेच दिए और शेयरों के हस्तांतरण को पूरा करने के लिए उसे वितरकों से एनओसी की आवश्यकता है। इस संबंध में, शिकायतकर्ता की कंपनी ने याची से एनओसी देने के लिए कहा था, लेकिन याची ने उक्त कंपनी पर 10 करोड़ रुपये का बकाया होने के कारण एनओसी प्रदान करने से इनकार कर दिया था।

बहस के दौरान अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि विपक्षी ने याची और उसके बेटे पर दबाव बनाने और झूठी और मनगढ़ंत कहानी के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की है। अधिवक्ता ने यह भी प्रस्तुत किया कि विवादित एफआईआर भी इस आधार पर रद्द करने योग्य है कि डिस्ट्रीब्यूटरशिप समझौते के खंड 10 (i) में यह उल्लेख है कि यदि पार्टियों के बीच कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो मध्यस्थता का प्रावधान है, लेकिन मामले को मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने के बजाय, एफआईआर दर्ज की गई है, जो पूरी तरह से अवैध है।

पक्षों के बीच विवाद पूरी तरह से दीवानी प्रकृति का है और सिर्फ दीवानी विवाद को रंग देने के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करायी गयी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने विपक्षि को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय और याचीगण को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। इसके अलावा मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने एक अंतरिम उपाय के रूप में मुकदमे की सूचीबद्ध होने की अगली तारीख तक याचीगण की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।

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