लिव इन रिलेशनशिप सामाजिक मर्यादा की कीमत पर स्वीकार्य नहीं : हाईकोर्ट
प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक विवाहित महिला और उसके लिव-इन पार्टनर द्वारा सुरक्षा की मांग को लेकर दाखिल याचिका को खारिज करते हुए कहा कि लिव इन रिलेशनशिप देश के सामाजिक ताने-बाने की कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ऐसी अवैधता की अनुमति देना उचित नहीं समझता है, क्योंकि बाद में याची यह कह सकते हैं कि न्यायालय ने उनके अवैध संबंधों को पवित्र घोषित कर दिया है। पुलिस को उन्हें सुरक्षा देने का निर्देश अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे अवैध संबंधों को न्यायिक सहमति देना है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायालय लिव इन रिलेशनशिप के खिलाफ नहीं बल्कि अवैध संबंधों के खिलाफ है।
उक्त आदेश न्यायमूर्ति रेनू अग्रवाल की एकलपीठ ने प्रयागराज की सुनीता व अन्य की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। दरअसल 37 वर्षीय विवाहित महिला और उसके लिव इन पार्टनर ने महिला के पति से खतरा बताकर याचिका दाखिल की थी। वर्ष 2015 से बिना शादी किए दोनों स्वेच्छा से लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं। महिला उसके पति के उदासीन व्यवहार के कारण उसके साथ नहीं रहना चाहती है ,लेकिन पिछले कुछ दिनों से उसके पति ने उनके शांतिपूर्ण जीवन में अशांति उत्पन्न करने का प्रयास किया है, जिसके कारण वे पुलिस सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं। याचिका का विरोध करते हुए सरकारी अधिवक्ता ने तर्क दिया है कि इस प्रकार के रिश्ते को न्यायालय द्वारा समर्थित नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही इसी न्यायालय की समन्वय पीठ द्वारा पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा कि समाजिक ताने-बने की कीमत पर इस तरह के रिश्ते को अस्तित्व में रखने के अनुमति नहीं दी जा सकती है। अंत में याचिका को निराधार पाते हुए खारिज कर दिया गया।
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