ध्रुवीकृत दुनिया में संतुलन

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
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उत्तरी सीमा पर चीन का सैन्य दबाव, पड़ोसी देशों में उसकी सैन्य और राजनीतिक पैठ तथा समुद्री सीमा पर उसकी नौसैनिक गतिविधि से भारत चिंतित है। चीन की बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए अमेरिका समेत कई पश्चिमी देश भारत को नाटो प्लस में शामिल करना चाहते हैं लेकिन भारत इस पर सहमत नहीं है।

चीन का मुकाबला करने और ताइवान के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए नाटो प्लस में भारत को शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है। उधर विदेश मंत्री जयशंकर ने हाल ही में साफ किया कि ‘नाटो प्लस’ के दर्जे के प्रति भारत ज्यादा उत्सुक नहीं है। भारत किसी भी सैन्य चुनौती से निपटने में सक्षम है। ‘नाटो प्लस’ दर्जे से खास फायदा नहीं है।

जानकार कह रहे हैं कि नाटो को लेकर भारत की सोच सही है। उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) में 31 सदस्य देश हैं। अमेरिका ने ‘नाटो प्लस’ संगठन बनाया हुआ है। इसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इजरायल, जापान और दक्षिण कोरिया हैं। इन देशों के साथ अमेरिका के सामरिक संबंध हैं। देखा जाए तो पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति में काफी बदलाव आया है।

एक समय गुटनिरपेक्ष आंदोलन और जी- 77 का समर्थक रहा, अब ब्रिक्स, क्वाड, एससीओ, जी-20 जैसे समूहों का सदस्य और जी-7 सहित अन्य समूहों का आमंत्रित सदस्य भी है। 
भारत ने अमेरिका और जापान के साथ मालाबार नौसैनिक अभ्यास में भाग लिया लेकिन चीन के साथ ब्रिक्स और एससीओ बैठकों में भी हिस्सा लिया।

हालांकि, भारत का संतुलनकारी कदम न तो चीन को भारतीय सीमा पर उसकी आक्रामकता से और न ही रूस को पाकिस्तान और चीन के साथ अपने संबंधों को गहरा करने से रोक सका। विशेषज्ञों के अनुसार विदेश नीति ऐसा क्षेत्र है, जहां देशों की सर्वश्रेष्ठ योजनाएं भी दूसरे खिलाड़ियों की योजनाओं के आधार पर बार-बार बदली, बनाई और बिगाड़ी जाती हैं।

 विदेश नीति अक्सर वह नहीं रहती, जो कोई देश अपने लिए तय करता है। इसका आखिरी रूप इस पर निर्भर करता है कि दूसरे देश उस देश के साथ क्या करते हैं। भारत के नाटो से जुड़ने को लेकर उठी बहस को भी इसी संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है। यह देखना अभी बाकी है कि भारत ध्रुवीकृत दुनिया में संतुलन बनाए रखने का जोखिम उठा सकता है या नहीं।