बरेली: जिला अस्पताल में छह महीने में 166 बच्चों ने तोड़ा दम

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। जिला अस्पताल में बच्चों की मौत का बढ़ता आंकड़ा चिंतित करने वाला है। पिछले छह महीने में ही जिला महिला अस्पताल में 140 बच्चों की मौत हो चुकी है, जबकि जिला अस्पताल में बीते छह माह में 26 बच्चों ने दम तोड़ा है। स्वास्थ्य विभाग इनके पीछे परिजनों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहरा रहा है। अफसरों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में बच्चों के इलाज के लिए सभी सुविधाएं हैं लेकिन समय से इलाज के लिए अस्पताल न आना बड़ी वजह है।

मृत्यु दर कम करने के लिए चलाई मुस्कान योजना
सरकार ने सरकारी अस्पतालों में शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए मुस्कान योजना शुरू की है। इसके तहत दो महीने पहले जिला महिला अस्पताल और जिला अस्पताल के बच्चा वार्ड में टीम का गठन किया गया है।

निमोनिया और सांस संबंधी रोग ले रहे जान
स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों के मुताबिक बच्चा वार्ड में अब तक जिन बच्चों की मौत हुई है, उनमें अधिकांश निमोनिया और सांस संबंधी रोगों से ग्रसित थे। परिवार वाले घर पर ही उनका निजी डॉक्टर से इलाज कराते रहे। जब हालत काफी बिगड़ गई तो लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। बच्चों को तुरंत इलाज दिया गया लेकिन हालत गंभीर होने की वजह से उन्हें नहीं बचाया जा सका।

केस 1
शहर के सिकलापुर में रहने वाले कपिल की ढाई वर्षीय बेटी सृष्टि को बीस अप्रैल को सुबह सात बजे परिजन हालत बिगड़ने पर जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। वह 13 दिन से बीमार थी। परिवार वाले उसका निजी डॉक्टर से इलाज करा रहे थे लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ। सृष्टि का गंभीर हालत में बच्चा वार्ड में भर्ती किया गया। जांच में वह निमोनिया और डायरिया से ग्रसित मिली। हालत गंभीर होने पर भर्ती होने के अगले दिन ही सुबह दस बजे उसने दम तोड़ दिया।

केस 2
अलीगंज में रहने वाले अनोखे 14 अप्रैल को सुबह 10:30 बजे अपने डेढ़ साल के बेटे देवांश को लेकर जिला अस्पताल पहुंचे थे। देवांश एक सप्ताह से बीमार था। वह कस्बे में ही एक झोलाछाप से उसका इलाज करा रहे थे लेकिन हालत में सुधार नहीं हुआ तो सरकारी अस्पताल में पहुंचे। जिला अस्पताल के बच्चा वार्ड में उसे भर्ती किया गया। जांच में निमोनिया की पुष्टि हुई। इलाज शुरू होने के बाद दोपहर एक बजे देवांश ने दम तोड़ दिया।

ये बन रहे मौत के कारण
- ऐसे बच्चों में मृत्यु दर काफी अधिक होती है जिनका वजन दो किलो से कम होता है।
- जो बच्चे जटिलताओं के साथ पैदा होते हैं या उन्हें रेफर करने में देरी की जाती है।
- गर्भावस्था के दौरान शिशु के स्वास्थ्य का पर्याप्त ख्याल न रखना, खून की कमी होना।
- स्थिति गंभीर होने तक सर्जरी का निर्णय लेने में देरी करना, अस्पतालों में अव्यवस्थाएं।

बच्चों की हालत गंभीर होने पर परिजन भर्ती कराने आते हैं। सीएचसी-पीएचसी से भी बच्चे गंभीर हालत में रेफर किए जा रहे हैं, जबकि जिला अस्पताल की तरह सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर बच्चों के इलाज की बेहतर सुविधाएं हैं। हालांकि बीते सालों की तुलना में बच्चों की मौत का आंकड़ा घटा है। भविष्य में शिशु मृत्यु दर और भी कम होगी। इसके लिए प्रबंधन प्रयासरत है। - डॉ. अलका शर्मा, एडीएसआईसी, जिला अस्पताल।

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