बरेली: तड़पती रहती हैं रात भर...डॉक्टरों को फर्क ही नहीं पड़ता, स्टाफ और अधिकारी भी बेपरवाह, जानिए मामला

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Edited By Amrit Vichar
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महिला अस्पताल में रात्रिकालीन प्रसव बंद जैसी स्थिति में, भीषण प्रसव पीड़ा के बावजूद करना पड़ता है सुबह का इंतजार

फोटो- जिला महिला अस्पताल की ओपीडी में मौजूद मरीज।

बरेली, अमृत विचार। सरकारी नौकरी का तकाजा भले ही रात में भी ड्यूटी का हो लेकिन जिला महिला अस्पताल की डॉक्टरों को अपनी नींद खराब करना गवारा नहीं है। यही वजह है कि यहां रात में होने वाले प्रसव की संख्या में हैरतअंगेज ढंग से गिरावट आई है। पिछले तीन महीने में रात में यहां सिर्फ 16 प्रसव हुए हैं जबकि इससे पहले रोज रात को तीन से चार प्रसव होने का औसत था। प्रसव पीड़ा से तड़पने के बावजूद गर्भवती महिला और उसके परिवार को सुबह होने का इंतजार करना पड़ रहा है।

जिला महिला अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक मई में यहां सिजेरियन ऑपरेशन कर 82 प्रसव कराए गए हैं। इनमें से रात आठ से सुबह आठ बजे तक ऑपरेशन थिएटर में सिर्फ नौ प्रसव हुए हैं। जून में सिजेरियन ऑपरेशन से हुए प्रसव की संख्या सौ है जिसमें से छह ही रात को हुए। जुलाई का आंकड़ा और भी ज्यादा चौंकाने वाला है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक एक जुलाई से अब तक महिला अस्पताल में 78 प्रसव हुए हैं। इनमें से एक ही सिजेरियन प्रसव रात में किया गया है।

रात को कराए जाने वाले रात्रि सिजेरियन प्रसव का लगातार ग्राफ घटने के बावजूद जिला महिला अस्पताल के अधिकारी बेखबर हैं। हालांकि रात को डॉक्टरों की अस्पताल में ड्यूटी रहती है, प्रसव पीड़ा से तड़पती हुई गर्भवती महिलाएं भी हमेशा की तरह अस्पताल पहुंचती हैं लेकिन रात में ही सिजेरियन प्रसव कराने के बजाय उन्हें बहाने बनाकर टाला जाता रहता है। अस्पताल के सूत्रों के मुताबिक कई बार महिलाओं की हालत बिगड़ने की घटनाएं तक हो चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद महिला अस्पताल प्रशासन का रवैया बदलने में नहीं आ रहा है।

अमानवीयता ही नहीं, शासन के निर्देशों को भी ठेंगा
जिला महिला अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के प्रति अमानवीयता ही नहीं दिखाई जा रही है बल्कि शासन के निर्देशों को भी ताक पर रख दिया गया है। शासन लगातार सुरक्षित मातृत्व योजना के तहत संस्थागत प्रसवों की संख्या बढ़ाने पर जोर दे रहा है लेकिन इसके लिए जिम्मेदार अधिकारी ही बेपरवाह बने हुए हैं। पिछले तीन महीनों से लगातार रात्रिकालीन सिजेरियन प्रसवों की संख्या घटने और गर्भवती महिलाओं के भारी दिक्कतों सेगुजरने के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। कई बार अत्यधिक प्रसव पीड़ा जान के जोखिम तक पहुंच जाती है लेकिन फिर भी कोई ख्याल नहीं रखा जा रहा है।

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