मुरादाबाद : दूसरों के घर मेहनत कर गुजर-बसर कर रहीं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नातिक की बेटी

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

योजनाएं तमाम लेकिन राशिदा परवीन तक नहीं पहुंचा लाभ, किराए के भवन में जिंदगी के कष्ट झेलने को विवश, बिटिया को पढ़ाकर सक्षम बनाने की कर रहीं कोशिश

मुरादाबाद, अमृत विचार। देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नातिक हुसैन आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन, उनका परिवार किस मुसीबत से जूझ रहा है, ये सार्वजनिक करना उचित तो नहीं है पर जिम्मेदार जानें और कम से कम जन कल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर उनकी मदद करें इसलिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार की वर्तमान स्थिति के बारे में चर्चा करना बेहद जरूरी भी है। 

सरकारी मदद न मिलने से सेनानी का परिवार तमाम परेशानी उठा रहा है। नातिक हुसैन के दोनों बेटे नासिर हुसैन व नादिर हुसैन भी अब दुनिया में नहीं है। दोनों भाइयों की छोटी बहन राशिदा परवीन के पति शाकिर हुसैन भी 11 साल पहले गुजर गए। पति के गुजरने के बाद राशिदा की मुसीबतें और बढ़ गईं। गरीबी के बीच छोटे-छोटे छह बच्चों को किस तरह पाल पोषकर बड़ा किया, यह तो वही जानती-समझती हैं। इस बीच उनको कोई मदद करने वाला नहीं मिला। जिससे उनकी जिंदगी तंगहाली में गुजर रही है। आज भी राशिदा परवीन दूसरों के घरों में काम कर बच्चों का लालन-पालन कर रही हैं।

राशिदा ने बताया कि बीमारी में अब उनसे काम होता नहीं है लेकिन, बच्चों के खर्चों को पूरा करने के चक्कर में वह दो घरों में काम करती हैं। बताया, हृदयाघात होने के बाद से उनके सीने में दर्द रहता है, दवा चल रही है। ऐसे में घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। राशिदा कहती हैं कि तंगहाली में वह दवा लेने में भी कंजूसी करती रहती हैं। उनके पास अपना घर तक नहीं है।

थाना नागफनी क्षेत्र में वह दसवां घाट के पास 3000 रुपये महीने के किराए पर दूसरे के घर में रहती हैं। उनके पांच बेटे हैं। इनमें जाहिद खिलौने की दुकान पर काम करता है और जुबेर कपड़े की दुकान पर। बेटा उमेर रेडीमेड कपड़े की और जीशान गंज में फूल बेचता है। कामरान अभी कक्षा-6 में पढ़ता है और समय पाकर किसरौल में बर्तन की दुकान पर गोल्ड चढ़ाने का काम करता है। इस तरह कुल 500-600 रुपये ये बच्चे पूरे दिन में कमा लेते हैं। बिटिया इकरा जीव विज्ञान से बीएससी द्वितीय वर्ष की पढ़ाई कर रही है। इकरा कहती हैं कि वह मां राशिदा बहुत ख्याल रखती हैं लेकिन, गरीबी के कारण वह भी परेशान रहती हैं।

इकरा कहती हैं कि बीएससी करने के बाद वह कुछ न कुछ जॉब कर मां की मदद करेंगी। इकरा कहती है कि मां पीली कोठी के पास बने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भवन में 15 अगस्त-26 जनवरी के कार्यक्रम में जाती जरूर है लेकिन, वहां परिवार कैसे चलता है किस मदद की जरूरत है, कोई नहीं पूछता। राशिदा परवीन ने भी बेटी को खूब पढ़ाने की ठान रखी है। वह कहती हैं कि उन्होंने कक्षा-6 तक पढ़ाई कर रखी है और पांच में चार बेटों को गरीबी के कारण पढ़ा नहीं सकी।इसलिए वह सोचती हैं कि कम से कम बिटिया इकरा और छोटा बेटा कामरान पढ़कर कुछ बन जाए ताकि इनको गरीबी न झेलनी पड़े।

भाइयों का भी नहीं मिला साथ, पति की मौत के बाद टूटी राशिदा के परिवार से अपनों ने भी बनाई दूरी 
राशिदा ने बताया कि उनके पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नातिक हुसैन भी मुरादाबाद में किराये के घर में रहते थे। उनकी वर्ष 1992 में दीवानखाने में मृत्यु हो गई थी, जबकि मां सावरी बेगम की मौत पिता नातिक हुसैन से पहले आज से करीब 22-23 साल पहले हुई थी। मां और फिर पति की मौत के बाद से राशिदा टूट गई थी। लेकिन, बच्चों को देखकर उन्होंने अपने आपको संभाला। राशिदा के मुताबिक, उनकी मां का निकाह उनके पिता नातिक हुसैन से भारत आजाद होने के बाद हुआ था। उन्होंने बताया कि बड़े भाई नासिर हुसैन देहरादून में रहते थे, उनके न रहने पर भी उनका परिवार वहीं रहता है। नासिर से छोटे भाई नादिर का परिवार किसरौल में रहता है लेकिन, इनके बेटे व परिवार के अन्य सदस्य राशिदा के घर हालचाल भी जानने नहीं आते हैं।

अंग्रेजों ने दी थी छह महीने की कड़ी सजा
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नातिक हुसैन मून वॉच कंपनी किसरौल के पास के रहने वाले थे। उन्होंने आजादी की जंग में शामिल होकर अंग्रेजों को खूब छकाया था। व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में अंग्रेज शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर छह महीने की कड़ी सजा सुनाकर जेल में डाल दिया था।

ये भी पढ़ें : मुरादाबाद : सूफी अंबा प्रसाद भटनागर ने अंग्रेजी हुकूमत को खूब छकाया, संपत्ति जब्त हो गई पर नहीं टेके थे घुटने

संबंधित समाचार