साइबर अपराध और सुरक्षा

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Edited By Amrit Vichar
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साइबर अपराधों की बढ़ती संख्या चिंतित करने वाली है। देश में पिछले तीन सालों में साइबर अपराध तीन गुना बढ़े हैं। साइबर अपराधों का शिकार बने लोगों की संख्या लाखों में जा पहुंची है। साथ ही जैसे-जैसे अधिक से अधिक नागरिक साइबर स्पेस में अपनी उपस्थिति बढ़ाते हैं, राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए साइबर सुरक्षा आवश्यक हो जाती है।

सरकार ने साइबर अपराध से निपटने और सुरक्षा लिए कई कदम उठाए हैं। वहीं संसद की स्थायी समिति ने सरकार को साइबर संरक्षण प्राधिकरण (सीपीए) के गठन का सुझाव दिया है। प्राधिकरण को ‘एथिकल हैकर्स’ की सेवाएं लेने को भी कहा है।

संसदीय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक तीन वर्षों में देश में बीस लाख लोग साइबर ठगी का शिकार हुए। इन लोगों से करीब ढाई हजार करोड़ रुपया ठगा गया है। आंकड़े बताते हैं कि अस्सी फीसदी से अधिक साइबर अपराध सिर्फ दस शहरों में हुए हैं। समिति के कई तथ्य चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट बताती है कि साइबर अपराध के मामलों में दो प्रतिशत से कम पीड़ित लोगों ने प्राथमिकी दर्ज करवाई। लोगों में धारणा है कि गया पैसा मुश्किल से ही लौटता है। वैसे भी आंकड़े बताते हैं कि ठगे गए 100 रुपये में से सिर्फ आठ रुपये की ही वापसी हुई। 

हाल ही में सीईआरटी-इन (इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम) एक नया निर्देश लेकर आया है, जहां कंपनियों को साइबर अपराध का पता चलने के छह घंटे के भीतर रिपोर्ट करना होगा। संसदीय समिति ने भी साइबर अपराध के शिकार लोगों के लिए मुआवजे की मौजूदा व्यवस्था को नाकाफी बताया है। हालांकि केंद्र सरकार ने देश में साइबर अपराध से संबंधित मुद्दों को व्यापक और समन्वित तरीके से संभालने के लिए भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र की स्थापना के लिए एक योजना शुरू की है। यानि साइबर सुरक्षा में सुधार और खतरों को कम करना प्राथमिकता में है।

निस्संदेह, देश में साइबर ठगी की घटनाओं से डिजिटल इंडिया के लक्ष्यों को हासिल करने में बाधा उत्पन्न होगी। क्योंकि जागरूकता के अभाव, साक्षरता दर में कमी और डिजिटल प्रणाली के असुरक्षित होने की धारणा के चलते ग्रामीण इलाकों में डिजिटली लेन-देन से परहेज किया जाता है। ऐसे में यदि सरकार साइबर सुरक्षा की गारंटी देगी और अपराधियों पर सख्ती से शिकंजा कसेगी तो लोगों का डिजिटल व्यवस्था पर विश्वास बढ़ेगा। इसके अलावा सरकार को मुआवजे के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया को भी आसान बनाने के बारे में सोचना चाहिए और इसमें वित्तीय संस्थानों को सहयोगी भूमिका निभानी चाहिए।