असहयोग आंदोलन को मूर्त रूप देने आए थे महात्मा गांधी, स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख केंद्र था मुरादाबाद

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असहयोग आंदोलन की यहीं बनी थी रुपरेखा

विनोद श्रीवास्तव, अमृत विचार। देश की आजादी की लड़ाई में मुरादाबाद का नाम भी इतिहास में दर्ज है। यहां से स्वतंत्रता संग्राम के कई लड़ाकों ने अंग्रेजी हूकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल उन्हें हिला दिया था। 9 अक्टूबर 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरुआत कर मूर्त रूप देने महात्मा गांधी भी मुरादाबाद पहुंचे थे। 

कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन की अध्यक्षता डॉ. भगवान दास ने की थी। प्रांतीय स्तर के इस अधिवेशन में महात्मा गांधी के अलावा जवाहर लाल नेहरू, पं. मदन मोहन मालवीय, बी अम्बा, आसफ अली, मोती लाल नेहरू जैसी बड़ी हस्तियों ने इसमें शामिल होकर असहयोग आंदोलन की एक तरह से शुरुआत यहीं से की। बाद में इसे पूरे देश में असहयोग आंदोलन को प्रमुख रूप से आगे बढ़ाया गया। देश की आजादी में मुरादाबाद के स्वतंत्रता संग्रामी सेनानियों का अविस्मरणीय  योगदान रहा है। 

याद रहेगा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान
स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में सक्रिय सहभागिता निभाने वाले श्रीराम अवतार दीक्षित और उनके पिता बूलचंद दीक्षित के परिवार के धवल दीक्षित बताते हैं कि इस प्रांतीय अधिवेशन के प्रस्तावों को बाद के अधिवेशन में मंजूर कर पारित किया गया। इसी प्रस्ताव के अनुरूप अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का बिगुल फूंका था। वह बताते हैं कि मुरादाबाद में सबसे पहले बनवारी लाल रहबर को गिरफ्तार किया गया था। पं. शंकर दत्त शर्मा, अशफाक हुसैन आदि की भी गिरफ्तारी हुई। अहमदाबाद अधिवेशन से लौटने पर प्रोफेसर रामशरण और पं. शंकर दत्त शर्मा पकड़ लिए गए। चौरी-चौरा कांड ने महात्मा गांधी को सोचने पर मजबूर कर दिया कि असहयोग आंदोलन के लिए जिस संयम एवं आत्मबल की जरूरत थी वह सत्याग्रहियों में नहीं है और फिर उन्होंने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया था। वह कहते हैं कि आजादी की लड़ाई में मुरादाबाद का योगदान अविस्मरणीय है। असहयोग आंदोलन के इतिहास में यहां के लोगों की सक्रिय भूमिका ने देश को आजाद कराने की नींव रख दी थी।

महात्मा गांधी दो बार आए
9-11 अक्टूबर को प्रांतीय सम्मेलन हुआ था। महात्मा गांधी 11 अक्टूबर तक मुरादाबाद में रहे। इसके बाद उनका दूसरी बार 6 अगस्त 1921 में आना हुआ। उन्होंने यहां तीन सभाओं को संबोधित किया था। उनका प्रवास 11-12 अक्टूबर 1921 को भी रहा। महात्मा गांधी की आवाज सुनने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था।

अधिवेशन में हुए थे प्रस्ताव
बुध बाजार के तत्कालीन महाराजा थिएटर जिसे बाद में सरोज सिनेमा के नाम से जाना गया, उसमें महात्मा गांधी, मोती लाल नेहरू, पं. जवाहर लाल नेहरू आदि की मौजूदगी में असहयोग और खिलाफत आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया। जिसे बाद में कोलकाता और नागपुर में होने वाले वार्षिक अधिवेशन में इसे पारित किया गया। असहयोग आंदोलन के दौरान 1921 के अंत में गिरफ्तारी शुरू हुईं। इसमें सम्भल, अमरोहा, हसनपुर तथा चन्दौसी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी जेल गए थे।

बृज रत्न पुस्तकालय का किया आरंभ
तीन दिवसीय दौरे में महात्मा गांधी ने कांग्रेस के प्रांतीय सम्मेलन को संबोधित किया था। अमरोहा गेट के बाजार में उन्होंने बृज रत्न हिंदू पुस्तकालय के नवीन भवन का उद्घाटन भी किया था। यहां के कांग्रेसियों में उन्होंने आंदोलन की अलख जगाई।

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