बरेली: विभाजन की यादें... अपने भी हुए पराए तो सबकुछ छोड़कर चले आए
हर तरफ खूनखराबे और लूटपाट के बीच पाकिस्तान से भारत आए लोगों की आंखों में अब भी जिंदा है वो खौफनाक मंजर, विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस
बरेली,अमृत विचार : देश का विभाजन हुए 75 साल से ज्यादा वक्त हो चुका है लेकिन जिन लोगों ने वह दौर अपनी आंखों से देखा था, उनके जेहन में उसकी रक्तरंजित यादें अब तक ताजा हैं। शहर की मॉडल टाउन कॉलोनी के तमाम घरों में उस खूनखराबे का कोई न कोई गवाह मौजूद है, लोगों ने अपने पुरखों से भी खूब कहानियां सुनी हैं कि विभाजन के बाद किस तरह अपने भी पराए हो गए और पूरी मानवता को खून से नहला दिया गया था।
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किस तरह वे लोग अपना सबकुछ छोड़कर पाकिस्तान से भारत आए थे और दोबारा खड़े होने में पूरी उम्र गुजर गई। विभाजन स्मृति दिवस की पूर्व संध्या पर ऐसे कई लोगों की आपबीती उन्हीं की जुबानी-
न किसी को तरस था न हमदर्दी, हर कोई एक-दूसरे को काट रहा था: माॅडल टाउन में रहने वाले जसवंत सिंह मदान 80 बरस के हैं। बताते हैं कि उनके पिता सरदार महल सिंह पाकिस्तान के श्यामकोट में रहते थे। विभाजन के समय उनकी उम्र 6 साल थी। उस समय वह इतना ही समझ पा रहे थे कि हर कोई एक-दूसरे को मार-काट रहा है लेकिन क्यों, यह समझ उन्हें नहीं थी।
बरेली आने के बाद बड़े होने पर उनके पिता के मुंह से विभाजन की घटनाओं के बारे में सुनकर उन्हें एहसास हुआ कि क्या हुआ था। उनके पिता ने उन्हें बताया था कि पाकिस्तान से भागते लोगों को भी रास्ते में पकड़कर गाजर-मूली की तरह काट दिया जा रहा था। किसी की आंखों में न तरस था न हमदर्दी। हर कोई एक-दूसरे को दुश्मन की नजरों से देख रहा था।
बमुश्किल उनके पिता उन लोगों को लेकर अमृतसर पहुंचे, जहां खाने-पीने और रुकने की व्यवस्था हुई। जिस समय यह कत्लेआम हुआ था, उस वक्त चारों ओर त्राहि-त्राहि मची थी। हर कोई पाकिस्तान से निकलने के लिए जूझ रहा था।
न जाने कितने लोगों को आंखों के सामने मार दिया, किस्मत थी जो बचकर आ गए: हरदीप सिंह के बाबा कृपाल सिंह लाहौर में रहते थे। उनका किराने का बड़ा काम था और कई गोदाम थे। विभाजन के बाद बाबा और उनके दो भाई वहां से जान बचाकर आए थे। साथ में दो बुआ भी थीं। सभी छह लोगों के तन पर कपड़ों के सिवा कुछ नहीं था।
भारत आने के बाद उनके बाबा कृपाल सिंह चंदौसी में रहे। बाकी दोनों भाइयों में एक चंडीगढ़ और दूसरे दिल्ली चले गए। पाकिस्तान में उनके पास काफी सोना था, लेकिन इसलिए साथ नहीं लाए कि रास्ते में उसके लिए कहीं मार न दिया जाए। उसे घर में ही जमीन में गाड़ दिया था लेकिन बाद में कभी पाकिस्तान जाना ही नहीं हो पाया। यहां गरीबी की वजह से उनके बाबा को मेहनत-मजदूरी करनी पड़ी।
पिता केहर सिंह को फल-सब्जी का ठेला लगाना पड़ा। 1965 में आढ़त खोली थी जिसे अब वह चला रहे हैं। बोले, संघर्ष भरा दौर तो उन्होंने भी देखा है लेकिन विभाजन की बातें अक्सर उनकी दादी बताती थीं। वह बताती थीं कि पाकिस्तान से निकल पाना बहुत मुश्किल था। किस्मत थी, जो बच गए। उनकी आंखों के सामने ही न जाने कितने लोगों को मार दिया गया।
घर-दुकान, करोड़ों की संपत्ति छूट गई भारत आए तो तन पर कपड़े ही बचे थे: मंजीत कौर अब 82 साल की हो चुकी हैं, विभाजन के समय उनकी उम्र सात साल थी। परिवार रावलपिंडी में बसा हुआ था। बताती हैं कि पिता महताब सिंह फौज में थे, 1942 की लड़ाई में उनके पैर कट गए थे। फिर भी किसी तरह वह हम लोगों को लेकर वहां से निकले। काफी जद्दोजहद करने के बाद आर्मी की गाड़ी उन लोगों को गूजरखान लाकर छोड़ गई।
करोड़ों की संपत्ति, घर, दुकान सबकुछ पाकिस्तान में ही छूट गया। तन पर कपड़ों के सिवा कुछ नहीं था। भारत में भी लंबे समय तक कोई ठौर-ठिकाना नहीं मिल पाया। बहुत संघर्ष के बाद हालात सामान्य हुए। मंजीत कहती हैं कि उनके नाना-नानी, मौसी और उनके बच्चों समेत 40 लोगों का परिवार था जिनमें से दो-चार ही बच पाए थे।
बाकी सभी को मार दिया गया था। वह लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे, जो अब जम्मू-कश्मीर में आ गया है। 1947 के नजारे अब भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। वह बहुत मनहूस दौर था। चारों तरफ मौत के सिवा कुछ और नजर नहीं आता था।
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