Allahabad High Court: संचार के युग में लिखित संदेश ना भेजना क्रूरता के आरोप को संदिग्ध बनाता है

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न व हत्या के मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि संचार के युग में मृतक द्वारा अपने माता-पिता को एक भी संदेश ना भेजना यह प्रदर्शित करता है कि क्रूरता का आरोप निश्चित रूप से संदिग्ध है। कोर्ट ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि मृतक को इस हद तक नहीं उकसाया गया था कि वह अपना जीवन समाप्त कर ले। 

इसके अलावा हाइपोइड हड्डी भी टूटी नहीं थी, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मृत्यु गला घोंटने के कारण नहीं बल्कि दम घुटने से हुई है। उपरोक्त सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली। उक्त आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की खंडपीठ ने सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए ललित कुमार पोसवाल के पिता अनिल कुमार की याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया। 

गौरतलब है कि शिकायतकर्ता की बेटी कृष्णा कुमारी का विवाह ललित मोहन पोसवाल से हुआ था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि ललित मोहन, उसके पिता, उसकी मां व उसकी बहन ने कृष्णा को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करके मार डाला। सत्र अदालत, गौतमबुद्ध नगर ने मृतिका के पति को आईपीसी की धारा 306 के तहत दोषी ठहराया। 

इस संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि मृतिका ने अपने परिवार के सदस्यों से कभी भी ससुरालवालों की क्रूरता के संबंध में शिकायत नहीं की। ई- संचार के युग में टेक्स्ट संदेश, ईमेल, व्हाट्सएप और अन्य मैसेजिंग सिस्टम का उपयोग ना कर मृतिका ने हमेशा अपने माता-पिता से फोन पर ही बात की, जिसका कोई लिखित प्रमाण नहीं है। ऐसी स्थिति में क्रूरता का आरोप संदिग्ध हो जाता है। 

मृतिका के पिता और भाई सशस्त्र बल में कार्यरत थे। एक शिक्षित व्यक्ति को उचित मंच के समक्ष शिकायत करनी चाहिए थी। कोई शिकायत ना होने पर क्रूरता का आरोप स्वत: संदिग्ध लगता है। इसके साथ ही मृतिका के फोन कॉल लंबी समयावधि के नहीं थे। 

अगर फोन कॉल पर शिकायतें की जाती तो निश्चित रूप से कॉल विवरण में समयावधि अधिक होती। अंत में कोर्ट ने कहा कि मामला आत्महत्या का है, क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट से भी यह सिद्ध हुआ है कि मौत फांसी लगाने के कारण हुई है। अतः याची की अपील स्वीकार कर ली गई।

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