श्रम बाजार में लैंगिक भेदभाव

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Edited By Amrit Vichar
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महिलाओं को श्रम बाजार में प्रवेश करने और अच्छे काम तक पहुंचने के लिए कई बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। श्रम बाजार में महिलाओं की भूमिका को समझना समाज के लिए महत्वपूर्ण है। इसी के चलते श्रम बाजार में स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव संबंधी समझ को बेहतर बनाने के लिए इस वर्ष अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार हार्वर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर क्लॉडिया गोल्डिन को देने की घोषणा की गई है। गोल्डिन श्रम बाजार में लैंगिक भेदभाव के मूल स्रोत पर ध्यान आकर्षित करती हैं और यह कि समय के साथ तथा विकास के क्रम में इसमें किस तरह बदलाव आया। शोध के मुताबिक पिछले 200 वर्ष में श्रम बाजार में महिला भागीदार का रुझान ऊपर की ओर नहीं था।

19 वीं सदी की शुरुआत में कृषि प्रधान समाज से औद्योगिक क्षेत्र में परिवर्तन के साथ विवाहित महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी कम हो गई लेकिन 20 वीं सदी की शुरुआत में सेवा क्षेत्र के साथ इसमें वृद्धि होने लगी। भविष्य में किन बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता हो सकती है। क्लॉडिया का शोध नीति निर्माताओं को समस्या से निपटने में मददगार साबित हो सकता है। वास्तव में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में विकासशील देशों और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में व्यापक अंतर नजर आता है।
यह अंतर पुरुषों की भागीदारी में अंतर की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है।

विश्व के अधिकांश विकासशील देशों की तुलना में भारत की स्थिति खराब है। जबकि भारत जैसे देश में महिला श्रम बल भागीदारी को सही मायनों में अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। महिला श्रम बल भागीदारी दर की स्थिति को देखते हुए देश के तीव्र विकास कर सकने की क्षमता का संकेत प्राप्त होता है। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2023 में 146 देशों में भारत 127 वें स्थान पर पहुंच गया है। जो इसकी रैंकिंग में सुधार का संकेत देता है।

2022 में भारत 135वें स्थान पर रहा। फिर भी भारत के सामाजिक मानदंड ऐसे हैं कि महिलाओं से परिवार की देखभाल और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा की जाती है। यह रूढ़िवादिता महिलाओं की श्रम शक्ति की भागीदारी में एक महत्वपूर्ण बाधा है। हालांकि श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी और वृहद् विकास परिणाम के बीच का संबंध बेहद जटिल है। श्रम बल में पर्याप्त हिस्सेदारी के बावजूद देश में महिला श्रमिकों की स्थिति दयनीय है। इसमें सुधार करने के लिए आवश्यक उपायों की जरुरत है।