मुरादाबाद : सद्भाव-आढ़त गुनगुनाती कौमी एकता के तराने...70 के दशक में पड़ी थी दो मित्रों में कारोबारी रिश्ते की बुनियाद

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 हरिशंकर शंखधार व मो.साबिर की आढ़त में हैं देवी-देवता व मक्का-मदीना की तस्वीरें

मंडी समिति में हरिशंकर शंखधार की आढ़त मे लगी देवी-देवता व मक्का-मदीना की तस्वीर।

आशुतोष मिश्र, अमृत विचार। जाति, मत और मजहब को लेकर विभाजन रेखा खींचने वालों के लिए हरिशंकर शंखधार और मोहम्मद साबिर राइनी की दोस्ती आइना है। दोनों ने 48 साल पहले साझे में मंडी में आलू प्याज की आढ़त शुरू की। 

हरिशंकर शंखधार अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनके जिगरी दोस्त साबिर भी अब बूढ़े हो चले हैं। दोनों का कारोबार अब अलग हो गया है लेकिन, आढ़त के बैठक में जहां भगवती दुर्गा सहित देवताओं की तस्वीर सजी है तो मक्का-मदीना का रूप वातावरण में साम्प्रदायिक एकता के गीत गुनगुना रहा है। कभी साझे की इस आढ़त को (सब्जी कारोबार) हरिशंकर के बेटे ने संभाल रखा है लेकिन, गद्दी कक्ष में रखी तस्वीरें कौमी एकता के गीत गुनगुना रहीं हैं। हर दिन यहां धूप और अगरबत्ती की सुगंध मंडी में हर किसी को अपनी ओर खींचती है।

मजबूत रिश्ते और सफल रोजगार की कहानी वाली आढ़त पर सभी धर्मों के लोग आते हैं। सड़क की पटरियों पर दुकान सजाकर दो जून की रोटी का प्रबंध करने वाले इकराम और बड़ी मंडी से गलियों में ठेले पर आलू, प्याज, लहसुन और अदरक की बिक्री करने वाले राजू सैनी को इस बात से तनिक फर्क नहीं पड़ता कि दो धर्मों की उपासना और इबादत के प्रतीकों की तस्वीर एक पांत में क्यों रखी है। हरिशंकर शंखधार के बेटे सोनू शंखधार अब आढ़त के संचालक के हैं। वह कारोबारी एकता और धार्मिक समन्वय के मुद्दे पर सिलसिलेवार अपनी बात रखते हैं। 

कहते हैं कि 70 के दशक में मेरे पिता और साबिर चाचा में मित्रता हो गई। तब कटघर क्षेत्र के गाड़ी खाना मोहल्ले में मेरी दुकान थी। साबिर राइनी मकबरा क्षेत्र में किसानों से शीतगृह में आलू-प्याज रखवाते थे। दोस्ती प्रगाढ़ हुई तो वर्ष 1975 में दोनों ने साझे में सब्जी की दुकान खोल ली। उसके बाद 1984 में यहां मंडी में आढ़त शुरू कर की। दो साल पहले मेरे पिता का निधन हो गया। साल 2000 तक हमारा कारोबार झूमकर साझे में चला। करीब 10 साल पहले साबिर राइनी ने केले का गोदाम खोल लिया। सोनू शंखधार कहते हैं कि साबिर चाचा की उम्र 85 साल के पार है। इसलिए उनका कारोबार उनके बेटे संभालते हैं। कारोबार भले ही अलग-अलग हो गया हो, लेकिन हमारे परिवारों में वही पुरानी एकता है। वह हमारे कारोबार की प्रगति जानते रहते रहते हैं। समय-समय पर आर्थिक सहयोग भी देते हैं।

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