BJP ने शुरू की बसपा के कोर वोट बैंक में सेंधमारी, कानपुर में 28 को दलित रैली की तैयारी, जुटेंगे दिग्गज
कानपुर में भाजपा ने शुरू की बसपा के कोर वोट बैंक में सेंधमारी।
कानपुर में भाजपा ने शुरू की बसपा के कोर वोट बैंक में सेंधमारी है। घोसी में हार, मायावती की निष्क्रियता लाभ उठाने में पार्टी जुटी। 2012 से 2022 तक सभी चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत गिरा।
कानपुर, [महेश शर्मा]। पिछले दो चुनाव में बसपा को गच्चा दे रहे दलित मतदाता का झुकाव बिखरता देख भाजपा ने कारगर दांव खेला है। पार्टी दलितों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार और सघन संपर्क के बूते बसपा के इस वोट बैंक का बड़ा हिस्सा अपनी तरफ लाने के प्लान पर काम कर रही है।
क्षेत्रीय सम्मेलनों की कड़ी में 28 अक्टूबर को होने दलित महासम्मेलन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और कुछ अन्य दलित लीडर भी आएंगे। कानपुर-बुंदेलखड क्षेत्र संगठन के लिहाज से 17 जिलों के दलित महासम्मेलन में डेढ़ लाख लोगों के आने का अनुमान है।
क्षेत्रीय अध्यक्ष प्रकाश पाल ने शुक्रवार को नौबस्ता स्थित क्षेत्रीय कार्यालय में इन सभी जिलों से दलित वर्ग के प्रमुखों व विधायकों की बैठक बुलायी है। बैठक में दलित महासम्मेलन में मुख्यमंत्री के आगमन पर तैयारियों की समीक्षा की जाएगी।

क्षेत्रीय अध्यक्ष प्रकाश पाल
बसपा का वोट बैंक दलित समाज अब धीरे-धीरे छिटक रहा है। यादव व मुसलमानों के कारण यह वोट बैंक समाजवादी पार्टी की तरफ भी नहीं जा रहा है। हां चुनावी राजनीति में इसका रुझान भाजपा की तरफ देखा गया है। राजनीतिक हल्कों में इसे मायावती के वोट बैंक में भाजपा की सेंधमारी कहा जा रहा है। लोकसभा 2024 चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के मुकाबले ‘इंडिया’ गठबंधन का एक प्रत्याशी उतारने की रणनीति भाजपा में हलचल है।
लोकसभा चुनाव में यूपी में मिशन 2024 की कामयाबी की प्लानिंग में भाजपा के रणनीतिकार जुटे हैं। संगठन ने क्षेत्रीय अध्यक्षों बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। दलित (अनुसूचित वर्ग) के सम्मेलनों की श्रृंखला 17 अक्टूबर जारी है। पश्चिम क्षेत्र से शुरू हुई इस श्रृंखला के तहत कानपुर का नंबर 28 अक्टूबर को आएगा।
पार्टी दलित वर्ग के सभी आठ मंत्रियों, 17 सांसदों और 64 विधायकों का सहयोग दलित महासम्मेलनों में ले रही है। जो जहां प्रभावी है उसे बुलाया जा रहा है। कानपुर-बुंदेलखंड के दलित महासम्मेलन की तैयारियों में मंत्री असीम अरुण, गुलाब देवी को खासतौर पर लगाया गया है। महासम्मेलन स्थल निरीक्षण शुक्रवार किया जाएगा।
दलितों पर भाजपा का विशेष फोकस की एक वजह यह भी बतायी जाती है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का जनाधार 2012 से लगातार घट रहा है। हालांकि मायावती 2007 से 2012 तक यूपी की सीएम रह चुकी हैं पर 2012 के चुनाव में विधानसभा चुनाव में बसपा को 25.95 फीसदी वोट मिले थे। और तो और बसपा को मिले मतदान का प्रतिशत 2014 के लोकसभा चुनाव में गिरकर 19.6 प्रतिशत पर आ गया।
पार्टी के प्रत्याशी हार गए। बाद में सपा से गठबंधन करके 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा और बसपा ने दस सीटें प्राप्त की। उसका वोट बैंक थोड़ा ही सही पर गिरकर 19.36 प्रतिशत पर आ गया। इस अनुभव के बाद 2022 के विधान सभा चुनाव बसपा ने अकेले लड़ा। और एक सीट ही जीत सकी।
इस चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत 12.3 फीसदी पर आ गया। जगाजाहिर है कि बसपा का कोर वोटर दलित है। भाजपा इसी में सेंधमारी में जुट गयी है। कानपुर-बुंदेलखंड के क्षेत्रीय अध्यक्ष प्रकाश पाल का दावा है कि दलितों के लिए सबसे ज्यादा काम भाजपा ने किया और सबसे ज्यादा दलित जन प्रतिनिधि भी भाजपा के ही है।
भाजपा का दलित प्रेम के तीन कारण बताए जाते हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी दलित वोटों को साधना शुरू कर दिया है। बीते मार्च में अखिलेश ने रायबरेली में कांशीराम की प्रतिमा का अनावरण भी किया। इसके बाद सपा ने पूर्वी उत्तर प्रदेश घोसी उपचुनाव जीता जहां से बसपा ने दूरी बनाए रखी थी। कहा जाता है कि दलित मतदाताओं का झुकाव सपा प्रत्याशी की तरफ रहा। एक कारण बसपा की कम सक्रियता का भी बताया जाता है। बीते पांच का बसपा का ट्रैक रिकार्ड देखें तो सक्रियता बहुत कम हो गयी है।
रणनीतिकार दलित वोटों के बिखराव का यह भी एक कारण मानते हैं। भाजपा नहीं चाहती है कि इसका लाभ सपा या कांग्रेस उठाए। दलित चेहरों को आगे करके महासम्मेलन करना भी भाजपा की रणनीति का हिस्सा बताया जाता है। घोसी उपचुनाव में हार से भी भाजपा को सबक मिला। जहां सपा के दारासिंह चौहान को 42.21 प्रतिशत वोट पाकर 2022 में जीते लेकिन उप चुनाव वही दारा भाजपा के टिकट पर आए और सपा के सुधाकर सिंह (57.2 प्रतिशत) से हार गए। जाटवों ने सपा पर भरोसा जताया।
