कृषि विधेयक पर रार

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Edited By Amrit Vichar
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केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि विधेयकों को लेकर इस वक्त जो हल्ला हो रहा है उसने निश्चित ही इस बात पर बहस शुरू कर दी है क्या सरकार ने इन विधेयकों को लेकर विपक्ष को विश्वास में लिया या नहीं। इस मामले में नाटकीय मोड़ तब आया जब कृषि विधेयकों से खफा केंद्रीय खाद्य …

केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि विधेयकों को लेकर इस वक्त जो हल्ला हो रहा है उसने निश्चित ही इस बात पर बहस शुरू कर दी है क्या सरकार ने इन विधेयकों को लेकर विपक्ष को विश्वास में लिया या नहीं। इस मामले में नाटकीय मोड़ तब आया जब कृषि विधेयकों से खफा केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री और शिरोमणि अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

कृषि विधेयकों को लेकर केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को बिचौलियों व तमाम अवरोधों से मुक्ति मिलेगी। किसानों को उनकी उपज को बेचने के नए अवसर मिलेंगे और उनका मुनाफा बढ़ेगा। हमारे देश का दुर्भाग्य है कि दलालों के चंगुल में फंसने के कारण किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है।

हाल ही में प्याज का मूल्य इसका एक उदाहरण है। जहां एक तरफ मंडियों में प्याज, टमाटर के सड़ने की खबरें आईं तो दूसरी तरफ किसानों को इसके बजिब दाम नहीं मिले और बाजार में प्याज की कीमतें आसमान छूने लगीं।

अगर किसानों की इस परेशानी का हल कृषि विधेयकों में होता है तो यह निश्चित ही सरकार का सराहनीय कदम होगा मगर विधेयक को लेकर सरकार को विपक्ष के संशय का भी समाधान करना पड़ेगा। इस विधेयक को लेकर जो आशंकाएं सामने आ रही हैं उनमें आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव से अनाज, दालों, तिलहन, आलू और प्याज के दाम बाजार के मुताबिक होंगे जिससे बिचौलियों को फायदा होगा।

न्यूनतम समर्थन मूल्य भी खत्म हो जाएगा और विपक्ष कह रहा है कि ऐसा होने से राज्यों की मंडियां धीरे-धीरे अपना वजूद खो देंगी। कृषि सुधारीकरण और किसानों के हित में सरकार अगर विधेयक ला रही है तो उसे विपक्ष की शंकाओं का समाधान अवश्य करना होगा। उधर विपक्ष इस मामले को लेकर आर-पार की लड़ाई के मूड में दिख रहा है।

खासकर पंजाब, हरियाणा में इसका ज्यादा विरोध हो रहा है। 24 सितंबर से किसानों ने रेल रोको आंदोलन का भी ऐलान कर दिया है। इसके अलावा राज्यबंदी का ऐलान भी शामिल है। लिहाजा केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि विपक्ष की शंकाओं का समाधान उसे करना होगा। वैसे भी यह परंपरा रही है कि सरकार के किसी निर्णय का अगर विरोध होता है तो उसे सवालों का उचित जवाब देना ही होगा। इस मामले में भी ऐसा ही होना चाहिए।