बरेली: कोरोना काल में बच्चों ने घर को ही बना दिया विद्यालय

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बरेली,अमृत विचार। कोरोना संकट काल में स्कूलों के खुलने पर फिलहाल पाबंदी लगी हुई है। ऐसे में बच्चों को स्कूल के प्रति रुझान भी कम होने लगा है। बच्चों का रुझान स्कूल के प्रति कम न हो इसके लिए निरंतर कार्य किए जा रहे हैं। इसी क्रम में एसआरजी ने ‘मेरा घर मेरा विद्यालय’ नवाचार …

बरेली,अमृत विचार। कोरोना संकट काल में स्कूलों के खुलने पर फिलहाल पाबंदी लगी हुई है। ऐसे में बच्चों को स्कूल के प्रति रुझान भी कम होने लगा है। बच्चों का रुझान स्कूल के प्रति कम न हो इसके लिए निरंतर कार्य किए जा रहे हैं। इसी क्रम में एसआरजी ने ‘मेरा घर मेरा विद्यालय’ नवाचार को दो ब्लॉकों में शुरू कराया है, पहला आलमपुर जाफराबाद और दूसरा क्यारा ब्लॉक। इन ब्लॉकों में कई शिक्षक इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। उनके इस प्रयास को प्रदेश स्तर पर भी सराहना मिल चुकी है।

स्टेट रिसोर्स ग्रुप (एसआरजी) डॉ. लक्ष्मी शुक्ला बताती हैं कि जब कोरोना संक्रमण की वजह से लॉकडाउन हुआ तो बच्चे स्कूलों से दूर हो गए। शिक्षकों के भी फोन उन्हें आते तो वे यही पूछते कि बच्चों को कैसे स्कूल की तरह शिक्षा मिले। इस उन्होंने जब शिक्षकों के साथ इस पर विचार किया तो ‘मेरा घर मेरा विद्यालय’ नया नवाचार निकलकर सामने आया। इस विचार को क्यारा और आलमपुर जाफराबाद ब्लॉक के स्कूलों में आजमाना शुरू कर दिया।

लक्ष्मी शुक्ला बताती हैं कि इसमें बच्चों को उनके घर में एक ऐसी जगह तलाशने के लिए कहा गया जहां बैठकर वे पढ़ाई करते हैं। उस जगह को बच्चों द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स, रचनाएं आदि क्रियाकलापों को सजाने के लिए प्रेरित किया। ऑनलाइन उनको जो भी कार्य दिया जाता वह उसकी वह रचना बनाकर घर की एक दीवार या कोने को उससे सजाते। इसको करने में बच्चों को भी आनंद आने लगा। इस तरह से उनको विद्यालय के जैसा माहौल ही घर में भी मिलने लगा है।

जब इसकी व्याख्या डॉ. लक्ष्मी ने अपने स्टेट ग्रुप में की तो उन्हें वहां से सराहना मिली। साथ ही इस मॉडल पर लगातार कार्य करने के लिए प्रेरित किया गया। एसआरजी के इस कार्य में लखौरा स्कूल की प्रधानाध्यापिका नीता जोशी और उच्च प्राथमिक विद्यालय पथरा की इंचार्ज अध्यापिका सारिका सक्सेना काम कर रही हैं।

“मैंने इस मॉडल में बच्चों की रुचि को और अधिक बढ़ाने के लिए अलग से भी कुछ प्रयास किए हैं। स्कूल के बच्चों को यह कहा है कि जिस भी बच्चे का ‘मेरा घर मेरा विद्यालय’ सबसे सुंदर होगा। उसे पुरस्कृत किया जाएगा। इससे बच्चों में एक होड़ मच गई है। वह पुरस्कार पाने के लिए एक दूसरे से अच्छा करने की कोशिश कर रहे हैं।” -नीता जोशी, प्रधानाध्यापिका प्राथमिक विद्यालय लखौरा, (क्यारा)

“कोरोना काल में बच्चों के फोन आते हैं कि मैडम स्कूल कब खुलेगा, मगर उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाते थे। जब ‘मेरा घर मेरा विद्यालय’ मॉडल के बारे में पता चला मैंने बच्चों को उससे जोड़ना शुरू कर दिया और आज का समय ऐसा है कि बच्चे खुद रचानाएं बनाकर मुझे भेजते हैं।” -सारिका सक्सेना, इंचार्ज अध्यापिका, उच्च प्राथमिक विद्यालय पथरा (आलमपुर जाफराबाद)

“मैंने इस मॉडल को दो ही ब्लॉकों में शुरू करवाया है। प्रदेश स्तर पर भी इसको काफी सराहना मिल चुकी है। अब तेजी से इसे और आगे बढ़ाना है। शिक्षकों की मदद से ही ऐसा संभव हो पाया है।” -डॉ. लक्ष्मी शुक्ला, एसआरजी

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