गवाहों की मौखिक गवाही दर्ज किए बिना जुर्माना लगाना अनुचित : HC

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि गवाहों की मौखिक गवाही दर्ज किए बिना बड़ा जुर्माना नहीं लगाया जा सकता है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की एकलपीठ सजा के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसके द्वारा याची सुरेश बाबू को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था और उससे तीन करोड़ 46 लाख रुपए की राशि वसूलने का निर्देश दिया गया था। 

याचिका के अनुसार याची को विद्युत सेवा आयोग, लखनऊ उत्तर प्रदेश द्वारा चयनित होने के बाद टेक्नीशियन (ग्रेड 2) (विद्युत) नियुक्त किया गया था। उसकी तैनाती बागपत में थी। बाद में मुख्य अभियंता हाइडल (हाइडल) लखनऊ के आदेश के तहत उन्हें जूनियर इंजीनियर के पद पर पदोन्नति करते हुए उसे गाजियाबाद स्थानांतरित कर दिया गया और जहां पर उसने 15 मई 2019 तक अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। याची को एक मामले में अधिशासी अभियंता बागपत द्वारा आईपीसी की धारा 409 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई और विभागीय कार्रवाई भी शुरू की गई। याची को जांच लंबित रहने तक निलंबित कर दिया गया था और निलंबन की अवधि के दौरान उसे गाजियाबाद के कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया था। 

कोर्ट ने दोनों पक्षों के द्वारा दिए गए तर्कों को सुनने के बाद कहा कि यह वह मानक नहीं है, जिसके द्वारा घरेलू जांच में विशेष रूप से गंभीर आरोपों पर जिसमें बड़ा जुर्माना लगाने की संभावना हो विभाग ने अपना मामला साबित कर दिया है। मुख्य रूप से ऐसे सभी मामलों में जहां आरोप साबित होने पर बड़ा जुर्माना लगाया जा सकता है यह विभाग का कर्तव्य है कि वह जांच अधिकारी के समक्ष अपने मामले को प्रमुख साक्ष्य या विशेष रूप से मौखिक साक्ष्य के जरिए साबित करें। आदेश में आगे कहा गया कि एक बार जब विभाग आरोपों के समर्थन में दस्तावेजी साक्ष्य देने और प्रासंगिक गवाहों की जांच करने के प्रमाण देता है तो क्या अपराधी पर अपने साक्ष्य को खंडन करने के लिए दस्तावेज और साथ ही मौखिक रूप से प्रस्तुत करने का बोझ स्थानांतरित हो जाता है। भले ही अपराधी बचाव में सबूत पेश नहीं करता है लेकिन इससे विभाग को गवाहों सहित आरोपों के समर्थन में सबूत पेश करने के उनके दायित्व से मुक्ति नहीं मिलती है। 

अंत में कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि वर्तमान मामले में किसी भी गवाह से पूछताछ नहीं की गई है और बेकार कागजात के आधार पर निष्कर्ष दर्ज किए गए हैं और जांच रिपोर्ट को त्रुटिपूर्ण माना जाता है।

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