बरेली: अब खुद खौफ के साये में शस्त्र विक्रेता... कुछ ही सालों में सात लाइसेंस सरेंडर
अनुपम सिंह, बरेली, अमृत विचार। पिस्टल, रिवाल्वर या रायफल रखने का क्रेज अब भी खत्म नहीं हुआ लेकिन नए शस्त्र लाइसेंस पर कई सालों से लगी रोक ने असलहे बेचने वालों का हाल खराब कर दिया है। नतीजा यह है कि शस्त्रों की दुकानें एक-एक कर बंद होने लगी हैं। शहर में ही पिछले कुछ सालों में सात दुकानों के लाइसेंस सरेंडर कर दिए गए हैं।
शस्त्र विक्रेताओं के मुताबिक उनका कारोबार कई सालों से भारी मंदी से जूझ रहा है। उनमें से ज्यादातर नो प्रॉफिट न लॉस की स्थिति में जैसे-तैसे कारोबार खींच रहे हैं। यही वजह है कि शहर में 15 साल से एक भी नई दुकान का लाइसेंस नहीं बना है।
शस्त्रों की दुकानों की किसी समय में क्या अहमियत थी, इसे समझने के लिए करीब 40 साल पुराने उस दौर को याद करना पड़ेगा, जब बंदूक रखने का शौक भी लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। गांव में जिसके पास गिनती रसूखदारों में हुआ करती थी। कुछ और समय गुजरा तो लोगों को बंदूक पुरातन हथियार लगने लगी और उसकी जगह रायफल और रिवॉल्वर-पिस्टल ने ले ली। उस दौर में शहर में शस्त्रों की 30 दुकानें हुआ करती थीं। शस्त्रों की दुकान चलाने वालों की गिनती भी रसूखदार लोगों में होती थी लेकिन नए शस्त्र लाइसेंस जारी होने पर रोक लगने के साथ इस कारोबार के भी दुर्दिन शुरू हो गए।
हथियार रखने के शौकीनों को तो इससे झटका लगा ही, शस्त्र विक्रेताओं को उससे भी तगड़ी चोट पहुंचीं। अब हालात ये हैं कि शस्त्र विक्रेताओं का इस कारोबार से मोह भंग होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों में शस्त्रों की सात दुकानें बंद कर उनके लाइसेंस सरेंडर कर दिए गए। इनमें एक बहेड़ी और बाकी शहर में थीं।
अब जिले में 15 से 16 शस्त्र की दुकानें ही बची हैं जिनमें 14 शहर में हैं। इसके अलावा एक दुकान आंवला और दूसरी फरीदपुर में बची है। शस्त्रों के कारोबार की क्या स्थिति हो गई है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 15 साल से शहर में एक भी नई दुकान नहीं खुली है।
हर महीने में बिकते थे तीन सौ तक असलहे, अब छह-छह महीने नहीं आता कोई ग्राहक
शस्त्र विक्रेताओं के अनुसार नए लाइसेंस पर कई सालों से चली आ रही रोक ने उनके कारोबार को बर्बाद कर दिया है। एक समय था, जब महीने भर में ही ढाई सौ से तीन सौ तक असलहे बिक जाते थे लेकिन अब तक कभी-कभी छह-छह महीने तक एक भी असलहा नहीं बिक पाता। पुराने समय में भी एक शस्त्र बिकने पर पांच से सात हजार रुपये तक का फायदा हो जाता था। शस्त्रों की दुकान की गिनती अच्छे कारोबार में होती थी। दुकान का लाइसेंस भी अच्छे रसूख पर ही मिल पाता था।
शस्त्र विक्रेताओं के लिए और भी झंझट बढ़े
शस्त्र दुकानों के सरेंडर करने के पीछे नए लाइसेंस न बनने से पहले जैसा फायदा न होना तो एक वजह है ही, इसके अलावा कई और भी कारण हैं। दुकानों के रिन्युवल के लिए अब 12 हजार की स्टांप ड्यूटी लगती है। दस हजार रुपये की फीस बगैरह मिलाकर इसमें करीब एक लाख का खर्च आ जाता है। पहले एक साल में रिन्युवल होता था अब पांच साल के लिए कर दिया गया है।
शस्त्रों की सेल न के बराबर है। बरसों पुरानी दुकान है, इसे बंद भी नहीं कर सकता। खर्च-पानी निकल आता है। कोई अब शस्त्रों की दुकान नहीं खोलना चाहता। 15 साल से एक नई दुकान नहीं खुली, कई पुरानी जरूर बंद हो गईं। स्टेशन रोड, कुतुबखाना, प्रेमनगर, चौपुला पुल, कोतवाली और बहेड़ी में कई दुकानें बंद हो गई हैं। लाइसेंस सरेंडर कर लोग दूसरे काम करने लगे हैं। - गुरजीत सिंह बिंद्रा, अध्यक्ष शस्त्र विक्रेता समिति
कुछ ही समय में देखते-देखते शस्त्र की कई दुकानें बंद हो गई हैं। नए लाइसेंस न बनने से कारोबार पर बड़ा फर्क पड़ा है। ऐसा नहीं कि इससे सरकार को नुकसान नहीं हुआ। एक बंदूक पर 18 फीसदी और रिवॉल्वर की सेल पर 28 फीसदी राजस्व सरकार को जाता है। दुकानों पर पुराने असलहों के सरेंडर करने और उनकी जगह नए लेने और शस्त्रों की सर्विस ही मुख्य काम बचा है। - जेएस शर्मा, शस्त्र विक्रेता
ये भी पढे़ं- बरेली: प्राइवेट बस ने साइकिल सवार को मारी टक्कर, मौके पर मौत, परिजनों ने किया हंगामा
