Allahabad High Court: श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद मामले में कोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति को मिली मंजूरी
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद मामले में बड़ा फैसला देते हुए हिंदू पक्ष को राहत दी है। कोर्ट ने गुरुवार को हुई सुनवाई में शाही ईदगाह परिसर में सर्वे के लिए तीन अधिवक्ताओं को कोर्ट कमिश्नर के रूप में नियुक्त करने की मंजूरी दे दी है। हालांकि यह सुनिश्चित नहीं है कि सर्वे कब से शुरू होगा। कोर्ट ने यह निर्देश दिया है कि तीन अधिवक्ताओं के पैनल को आयोग के रूप में नियुक्त करने से किसी भी पक्ष को कोई नुकसान न पहुंचे।
आयुक्त की रिपोर्ट मामले के गुण-दोष पर प्रभाव नहीं डालेगी। सर्वेक्षण के दौरान परिसर की पवित्रता को सख्ती से बनाए रखने के साथ ही मूल संरचना को किसी भी तरह का कोई नुकसान न पहुंचाने का निर्देश भी दिया गया है। वास्तविक वस्तुस्थिति के आधार पर अपनी निष्पक्ष रिपोर्ट बनाना आयोग का प्रथम कर्तव्य होगा। इसके अलावा विपक्षी आयोग की रिपोर्ट पर अपनी आपत्तियां भी दर्ज करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
मालूम हो कि न्यायमूर्ति मयंक कुमार जैन की एकलपीठ ने श्री कृष्ण विराजमान और 7 अन्य द्वारा सीपीसी के आदेश 26 नियम 9 के तहत दाखिल आवेदन पर फैसला 16 नवंबर को हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं हरिशंकर जैन, विष्णु शंकर जैन, प्रभाष पांडेय और देवकीनंदन शर्मा के तर्कों को सुनने के बाद सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने तर्क दिया था कि भगवान श्री कृष्ण विष्णु के अवतार हैं।
उन्होंने लगभग 5132 वर्ष पूर्व द्वापर युग में मथुरा के कारागार में भाद्रपद माह की अष्टमी को जन्म लिया था, जिसे कटरा केशव देव के नाम से जाना जाता है। कटरा केशव देव की एक-एक इंच भूमि भगवान श्री कृष्ण के भक्तों के लिए पवित्र है। गौरतलब है कि मथुरा विवाद से जुड़ी सभी 18 याचिकाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट एक साथ सुनवाई कर रहा है। पूरा विवाद 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक को लेकर है। इस जमीन के 11 एकड़ में श्री कृष्ण जन्मभूमि है तो वहीं बचे हुए 2.37 एकड़ में शाही ईदगाह मस्जिद बनी हुई है, जिसको लेकर वर्षों से विवाद चल रहा है।
हिंदू पक्ष पूरी जमीन भगवान श्री कृष्ण की मानते हैं, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे गलत बताता है। इस विवाद की जड़ें इतिहास के पन्नों से जुड़ी हैं। सन् 1618 में ओरछा नरेश वीर सिंह बुंदेला ने मथुरा के कटरा केशव देव में भगवान कृष्ण के जन्मस्थान पर एक मंदिर का निर्माण करवाया था। सन् 1670 में औरंगज़ेब ने मथुरा के श्री कृष्ण जन्मस्थान को तोड़ने का आदेश जारी किया। बादशाह का आदेश मिलते ही मंदिर को तुरंत गिरा दिया गया और उसकी जगह ईदगाह मस्जिद तामील हो गई।
सन् 1770 में मुगल-मराठा युद्ध हुआ। युद्ध में विजयी होने के बाद मराठों ने फिर से मंदिर का निर्माण कराया और उक्त भूमि को नजूल भूमि घोषित कर दिया, लेकिन मंदिर धीरे-धीरे कमजोर होता गया और एक बार भूकंप की चपेट में आकर पूरी तरह ध्वस्त हो गया। 19वीं सदी में अंग्रेज मथुरा पहुंचे और 1815 में कटरा केशव देव की 13.37 एकड़ जमीन को नीलाम किया। उस समय काशी के राजा पटनीमल ने जमीन को खरीद लिया, लेकिन 100 सालों तक यह जगह खाली पड़ी रही।
सन् 1944 में राजा पटनीमल के उत्तराधिकारियों ने कटरा केशव देव की 13.37 एकड़ भूमि का विक्रय पत्र महामना मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश दत्त और भीकेन लालजी आत्रे के पक्ष में निष्पादित किया, जिसकी विक्रय राशि उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने अदा की थी। इसके बाद सन् 1951 में श्री कृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट बना और ट्रस्ट ने चंदे के पैसे से 1953 में मंदिर का निर्माण शुरू करवाया, जो 1958 तक चला। 1958 में एक नई संस्था बनी, जिसका नाम श्री कृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ रखा गया। इसी संस्था ने 1968 में मुस्लिम पक्ष के साथ एक समझौता किया।
समझौते के अनुसार जमीन पर मंदिर और मस्जिद दोनों रहेंगे। हालांकि समझौते का कभी कोई कानूनी वजूद नहीं रहा। विवादित भूमि को लेकर रंजना अग्निहोत्री नामक महिला ने सबसे पहले याचिका दाखिल की थी। याचिका में महिला ने सर्वे के लिए कमिश्नर की नियुक्ति की मांग की थी। इसके बाद कोर्ट में ईदगाह मस्जिद के सर्वे को लेकर कई मामले दाखिल हुए। वर्तमान में 18 याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है, जिसमें से एक याचिका पर फैसला आ चुका है। शेष याचिकाओं पर आगामी 18 दिसंबर को सुनवाई होगी।
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