पीलीभीत: खेती किसानी में भी पारंगत हो रहे ड्रमंड कॉलेज के छात्र, उगा रहे मशरूम

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Edited By Amrit Vichar
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पीलीभीत, अमृत विचार। प्रधानमंत्री मोदी की ओर से लगातार आत्मनिर्भर भारत बनाने पर जोर दिया जा रहा है। जिस पर ड्रमंड राजकीय इंटर कॉलेज के छात्र खरे उतर रहे हैं। अभी तक खेती में सिर्फ किसान ही फसलों की पैदावार करते थे। लेकिन अब कृषि संकाय के छात्रों ने बिना भूमि के कम लागत में खेती करने की विधि से खुद को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयोग किया है। छात्रों के द्वारा पराली और भूसे से मशरूम उत्पादन की पैदावार की  गई है। अन्य छात्रों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत भी बन रहे हैं।

प्रदूषण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिसका एक प्रमुख कारण पराली जलाने को भी माना जाता है। जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद पराली जलाने के मामले लगातार सामने आते हैं। हालांकि कुछ किसान ऐसे भी हैं, जो पराली जलाने की बजाय उसका प्रबंधन कर रहे हैं।

ड्रमंड राजकीय इंटर कॉलेज के छात्रों ने पराली प्रबंधन कर उसे मशरूम उत्पादन की नजीर पेश की है। कृषि संकाय के छात्र करन कुमार जोकि 12वीं के छात्र हैं। उन्होंने बताया कि पढ़ाई के समय से ही पराली को लेकर काफी सुना था। इससे जलाने से प्रदूषण फैलता है। पिछले साल कॉलेज के प्रवक्ता आर पी गंगवार के साथ पंतनगर भ्रमण करने के लिए गए थे।

वहां भूसे से मशरूम उत्पादन होते देखा था। जिसके बाद मशरूम उत्पादन करने पर प्रवक्ता आरपी गंगवार  से विचार विमर्श किया। ट्रॉयल के तौर पर अपने घर के छोटे से कमरे में मशरूम उत्पादन की विधि को शुरू किया। पराली से मशरूम बनाने के लिए पहले उसे छोटा-छोटा काटना होगा।

इसे पांच-पांच किलो के बैग में भरना होगा। जिसमें आयस्पॉन का बीज डालकर छोड़ दिया जाता है। जहां मशरूम उत्पादन कर रहे हैं, वहां तापमान मेंटेन रहना चाहिए। 80 से 90 डिग्री मॉइस्चर रहना चाहिए। जिसके बाद 20 से 22 दिनों में मशरूम तैयार हो जाती है। जिन बैग में पराली को भरा जाता है। उनमें सुराग कर रुई लगानी होगी।

जिनसे मशरूम के कल्ले बाहर आने लगते हैं। खास बात यह है कि एक बैग से तीन बार मशरुम निकलती है। उनका कहना है कि यह शुद्ध और बिना किसी रसायन क्रिया के तैयार होती है। स्वास्थ्य के प्रति भी लाभदायक है। अब तक इस मशरूम उत्पादन से करीब 60 से 70 हजार रुपये की आमदनी भी की है।इस प्रोजेक्ट से पराली को भी जलाने से रोका जा सकता है, साथ ही आत्मनिर्भर भी बन सकते हैं।

एक से हुई शुरुआत, अब बढ़ने लगी छात्रों की रुचि
छात्र करन के मशरूम उत्पादन करने के बाद कृषि संकाय के अन्य छात्रों में भी इसके प्रति रुचि बढ़ने लगी है। जिसके बाद धीरे-धीरे अन्य छात्रों की संख्या बढ़ने लगी है। अब तक 54 छात्र मशरूम उत्पादन कर रहे हैं। साथ ही उन्हें सीखने के लिए कॉलेज कैंपस में भी एक कमरे में मशरूम का उत्पादन कराया जा रहा है। ताकि अन्य छात्र सीख सकें। कॉलेज में भी बांस पर एक स्ट्रक्चर तैयार किया गया है। बैग में पराली और भूसे से मशरूम तैयार की जा रही है।

मशरूम निकालने के बाद खाद में कर सकते हैं प्रयोग
पराली में मशरूम उत्पादन करने के साथ ही उसे  निकलने वाली पराली को प्रयोग खाद के रूप में खेत में कर सकते हैं। जो ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देती है। एक बार मशरुम उत्पादन के लिए पराली डालने के बाद 22 दिन में मशरूम निकली थी। जिसमें 22-22 दिन के अंतराल में मशरूम निकलेगी। जिसके बाद उस पराली को अब खाद  बनाकर खेत में डाल सकते हैं।

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