बरेली: उस बुखार से सैकड़ों मौतों के लिए याद रखा जाएगा 2023 जिसे स्वास्थ्य विभाग ने कोई नाम नहीं दिया

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। स्वास्थ्य विभाग में साल 2023 नाउम्मीदी भरा रहा। जनप्रतिनिधियों ने मरीजों के लिए नई-नई जिन योजनाओं का बखान किया, अफसरों ने अपने कागजों में उनका खूबसूरत खाका खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन मरीज साल भर जूझते रहे। 

स्वास्थ्य विभाग के लिए साल की सबसे बड़ी घटना डेंगू जैसे बुखार के लक्षणों से सैकड़ों लोगों की मौत हो जाना रही, एक-एक परिवार में कई-कई लोग चल बसे लेकिन अफसरों ने न उसे डेंगू माना, न पर्याप्त टेस्ट कराकर डेंगू की पुष्टि होने दी। प्राइवेट डॉक्टरों ने जरूर डेंगू के नाम पर मरीजों से जमकर लूट की। इस लूटखसोट में तमाम लोगों ने जमा पूंजी ही नहीं गंवाई, जान से भी चले गए। तड़ापड़ मौतों के इस दौर में न प्रशासन के अफसरों की संवेदना जागी, न जनप्रतिनिधियों ने प्रभावित इलाकों में जाकर लोगों का हाल लिया।

नई-नई इमारतें बनाने में खूब पैसा फूंका, डॉक्टर-स्टाफ की तैनाती से खींचे हाथ
डॉक्टरों और स्टाफ की कमी स्वास्थ्य विभाग के लिए खुद गंभीर बीमारी बनी हुई है। साल 2023 में भी इसमें कोई सुधार नहीं हुआ। मरीजों को नए-नए सपने दिखाते हुए नई-नई बिल्डिंग बनाने में खूब पैसा फूंका गया लेकिन जब उनमें डॉक्टर और स्टाफ तैनात करने का वक्त आया तो मुंह मोड़ लिया गया।

अस्पतालों में और बढ़ गई डॉक्टरों की कमी
स्वास्थ्य विभाग में लाखों और करोड़ों की लागत से नई-नई बिल्डिंग बनाने में तो दिलचस्पी ली गई लेकिन डॉक्टरों को तैनात करने में नहीं। पूरे जिले में स्थाई डॉक्टरों के कुल 237 पद स्वीकृत हैं, लेकिन 2023 की शुरुआत में 163 डॉक्टर ही तैनात थे। जिला अस्पताल की स्थिति 47 पदों के सापेक्ष 28 डॉक्टरों की तैनाती की थी। 2023 में सात डॉक्टर रिटायर होने के बाद स्थिति और खराब हो गई। विशेषज्ञ डॉक्टरों के 60 फीसदी पद कई सालों से रिक्त हैं। विभाग कई सालों से स्थाई पदों पर नियुक्ति के लिए शासन को पत्र भेज रहा है लेकिन शासन सुनने को तैयार नहीं है।

ट्रॉमा विंग तैयार पर शुरू नहीं हो पा रहा
जिला अस्पताल परिसर में ही वर्ष 2018 में ट्रॉमा विंग बनाने का प्रस्ताव मंजूर हुआ। मगर कोविड की वजह से निर्माण डेढ़ साल देरी से शुरू हो पाया। अब तीन महीने पहले ट्रॉमा विंग बनकर तैयार हो गया है लेकिन और कई अस्पतालों की तरह स्टाफ का बंदोबस्त नहीं हो पा रहा है। एनओसी का भी पेच फंसा हुआ है। इस वजह से बनने के बावजूद ट्रॉमा विंग शुरू नहीं हो पा रहा है।

बिना डॉक्टर और स्टाफ का तीन सौ बेड अस्पताल
बरेली को सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल का तोहफा देने के नाम पर 70 करोड़ के बजट से बना तीन सौ बेड अस्पताल भी सफेद हाथी बनकर रह गया। 2016 में यह बनकर तैयार हो गया था लेकिन सुपर स्पेशियलिटी सुविधाएं देने के लिए स्टाफ और डॉक्टर के इसे शुरू करने की अनुमति ही नहीं मिली। सात साल बाद भी यहां मरीजों को भर्ती करने यानीआईपीडी सुविधा नहीं है। कामचलाऊ ढंग से सिर्फ ओपीडी चलाई जा रही है। यहां से करोड़ों के उपकरण चोरी हो चुके हैं और उनकी जांच तक पूरी नहीं हो पा रही है। 2023 भी इसे इसके हाल पर छोड़कर निकलने वाला है।

हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों पर भी बगैर डॉक्टर इलाज का दावा
दावा किया गया था कि शहर और देहात में लोगों को घर के पास हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों पर चिकित्सा सुविधाएं मिलेंगी। मगर ये सेंटर भी मरीजों के लिए 2023 का एक और सरकारी धोखा साबित होकर रह गए। जिले भर में ज्यादातर सेंटरों पर डॉक्टरों की तैनाती नहीं है। हवाई दावों की असलियत यह है कि कई सेंटरों पर बिजली का कनेक्शन तक नहीं कराया गया है। फिर भी मरीजों का इलाज करने के दावे किए जा रहे हैं।

देर से बैठने और बाहर की दवाएं लिखने की आदत नहीं छोड़ पाए डॉक्टर
सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के समय से न बैठने, अक्सर गायब रहने और मरीजों को बाहर की महंगी दवाएं लिखने का सिलसिला साल के अंत तक नहीं बदल पाया। कहने को अफसरों ने कागजी खानापूरी खूब की, हवाई चेतावनियां भी लगातार जारी होती रहीं। प्रशासन के उच्चाधिकारियों के दौरे भी घिसे-घिसाए निर्देशों और तड़क-भड़क के साथ बेअसर होते रहे। साल के आखिरी महीने में भी जिला अस्पताल की एडीएसआईसी ने डॉक्टरों को बाहर से दवाएं लिखने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी जारी की लेकिन डॉक्टरों पर उसका कोई असर नहीं पड़ा।

मरीजों से वसूली के तमाम मामले, कार्रवाई कुछ नहीं
सरकारी अस्पतालों में मरीजों से वसूली के भी पूरे साल मामले सामने आते रहे। तमाम मरीजों ने अफसरों से लिखित शिकायतें भी कीं लेकिन कार्रवाई एक भी मामले में नहीं हुई।

नहीं चल पाए हेल्थ एटीएम
लाखों कीमत के अलग-अलग अस्पतालों में छह एटीएम साल की शुरुआत में लगवाए गए थे ताकि मरीजों को पैथोलॉजी जांचों के लिए लैब के चक्कर न काटने पड़ें लेकिन एक भी एटीएम चल ही नहीं पाया। साल के अंत तक ये एटीएम धूल फांक रहे हैं और धीरे-धीरे कबाड़ में तब्दील होते जा रहे हैं।

साल की बड़ी घटनाएं छह महीने में 140 बच्चों की मौत
जिला महिला अस्पताल शुरुआती छह महीनों में 140 बच्चों की मौत हो गई लेकिन यह भयावह आंकड़ा कागजों में ही दबा रह गया और इस पर किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई। मौतों का यह सिलसिला अब भी जारी है। अस्पताल में जन्मे बच्चों की मौत पर डेथ ऑडिट तक गंभीरता से नहीं किया जा रहा है।
एसएनसीयू में आग

जिला महिला अस्पताल के एसएनसीयू में आग लगने से बड़ा हादसा होने से बचा। आग बिजली की लाइन में छेड़छाड़ किए जाने के कारण हुए शॉर्ट सर्किट से लगी। आननफानन नवजात शिशुओं को हटाने के दौरान एक बच्चे की भी मौत हो गई। इसके बाद एसएनसीयू को कई दिन बंद रखना पड़ा।

डेढ़ करोड़ का अनुपयोगी बजट
महिला अस्पताल की पूर्व सीएमएस की ओर से शासन से डेढ़ करोड़ का बजट ऐसे कामों के लिए मंजूर करा लिया गया जो उपयोगी ही नहीं थे। मौजूदा सीएमएस ने यह बजट वापस कर दिया। इस घटनाक्रम ने यह भी पोल खोल दी कि स्वास्थ्य विभाग में जरूरत नहीं बल्कि जुगाड़ से बजट मंजूर कराया जा सकता है।

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