फैसला सुरक्षित रखने के बाद भी आरोपों में बदलाव या इजाफा संभव : हाईकोर्ट 

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान न्याय की वास्तविक परिभाषा को समझाते हुए न्यायालय की विशेष शक्तियों की व्याख्या की है। न्यायालय का कर्तव्य वास्तविक अपराधी को दंड देकर न्याय करना है। अगर जांच एजेंसी किसी कारण से किसी एक आरोपी को सूचीबद्ध नहीं करती है तो अदालत उक्त आरोपी को मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाने की शक्ति रखती है। प्रश्न यह है कि कोर्ट को किन परिस्थितियों में और किस स्तर पर अपनी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रश्न के उत्तर में कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 319 को संदर्भित करते हुए बताया कि अदालत को किसी भी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करने की अनुमति है जो उसके समक्ष किसी भी मामले में आरोपी नहीं है। यह जरूरी नहीं है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ ऐसी शक्तियों का प्रयोग करते हुए समन जारी किया जाता है, वह पहले से ही मुकदमे का सामना कर रहा आरोपी हो। वह या तो आरोप पत्र में नामित व्यक्ति हो सकता है या कोर्ट के समक्ष अपराध में उसकी संलिप्तता सिद्ध हुई हो। उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की एकलपीठ ने हेमंत कुमार सिंह उर्फ़ गोपाल सिंह की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए की। 

दरअसल याची ने 13 दिसंबर 2018 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गाजीपुर द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी, जिसमें याची को सीआरपीसी की धारा 319 के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए समन जारी किया गया था। याची का तर्क था कि ट्रायल के दौरान कोर्ट अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उन्हें कैसे तलब कर सकती है। गौरतलब है कि याची और सह अभियुक्त अशोक कुमार सिंह के खिलाफ थाना कासिमाबाद, गाज़ीपुर में आईपीसी की धारा 504, 506 के तहत मामला दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में शिकायतकर्ता द्वारा दाखिल अर्जी को स्वीकार करते हुए आईपीसी की धारा 307 भी जोड़ दी गई। जिसके तहत याची को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी किया गया। वहीं दूसरी ओर ट्रायल पूरा होने के बाद एक अतिरिक्त धारा जोड़ने के निचली अदालत के फैसले को सह अभियुक्त ने भी चुनौती दी थी।

हालांकि याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के हवाले से हाईकोर्ट ने बताया कि सीआरपीसी की धारा 216 ट्रायल कोर्ट को यह शक्ति देती है कि सबूत पूरे होने, दलीलें सुनने और फैसला सुरक्षित रखने के बाद भी आरोपों में बदलाव या इजाफा किया जा सकता है। उक्त धारा के तहत ट्रायल कोर्ट की शक्ति बहुत व्यापक है और न्याय के हित में उचित मामलों में इसका प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन अदालतों को यह भी देखना चाहिए कि उसके आदेश अभियुक्त पर कोई प्रतिकूल प्रभाव ना डालें। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 216 के तहत आरोपों को जोड़ने या संशोधित करने की शक्ति का प्रयोग ट्रायल कोर्ट तभी कर सकती है, जब उसके समक्ष कोई ऐसी सामग्री मौजूद हो, जिसका आरोपों से कुछ संबंध सिद्ध होता हो। उक्त मामले में कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए आईपीसी की धारा 307 के तहत आरोप जोड़ने के मामले को रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य के आधार पर उचित माना।

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