बरेली: पूर्व बोर्ड में खरीदे गए मोबाइल सेट जमा किए नहीं और पा गए चुनाव लड़ने की एनओसी
सुरेश पांडेय, बरेली, अमृत विचार। नगर निगम एक्ट और शहर की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की चिंता किए बगैर बोर्ड के पिछले कार्यकाल में भी अपने पार्षदों को मुफ्त मोबाइल फोन दिए गए थे। इस पर सख्त ऑडिट आपत्ति हुई थी, जिसमें इसे वित्तीय अनियमितता बताया गया था लेकिन इस बार फिर पार्षदों को और महंगे फोन देने की तैयारी है। सड़क-नाली और स्ट्रीट लाइट की मांग करने वालों को नगर निगम में पैसा न होने की बात कहकर लौटा देने वाले यह परवाह भी करने को तैयार नहीं है कि आगे जनता का सामना कैसे करेंगे।
पार्षदों को मुफ्त मोबाइल फोन बांटने की प्रक्रिया में नगर निगम के कई और नियम दांव पर लगे हुए हैं। पिछली बार जिन पार्षदों को मुफ्त मोबाइल फोन दिए गए थे, कार्यकाल खत्म होने के बाद उनसे अफसरों ने वे फोन जमा कराए बगैर ही अगला चुनाव लड़ने के लिए एनओसी जारी कर दी। पार्षदों ने सिर्फ सिमकार्ड वापस किए और मोबाइल फोन टूटने का बहाना बना दिया। अफसरों की सफाई है कि मोबाइल सेट की मियाद ही तीन साल होती है जिसके बाद वे निष्प्रयोज्य हो जाते हैं। इसलिए उनका जमा होना महत्वपूर्ण नहीं है। पार्षदों से सिम जमा करा लिए गए थे, इसी के बाद एनओसी दी गई थी।
अफसर पार्षदों को मोबाइल फोन देने के मामले में हुई ऑडिट आपत्ति पर बात तक करने से कतरा रहे हैं। नियंत्रक महालेखा परीक्षक की ओर से लगाई इस आपत्ति में इसे लेखा नियमों के उल्लंघन और वित्तीय अनियमितता के तौर पर इंगित किया गया था। दो महीने पहले ही इस आपत्ति का जवाब भेजने के साथ ही नए पार्षदों के लिए 5 जी मोबाइल सेट खरीदने की तैयारी शुरू कर दी गई। नगर निगम एक्ट के जानकार पूर्व पार्षद राजेश तिवारी का कहना है कि ऑडिट आपत्ति के बाद जांच हुई तो लेखा के अफसरों के सेवानिवृत्ति लाभ से इस रकम की भरपाई की जा सकती है। उन्होंने कहा कि पार्षदों को मोबाइल सेट देने के लिए शासन से मंजूरी ली जानी चाहिए थी। पूरी प्रक्रिया में यह गंभीर अनियमितता की गई है।
कंगाली के दौर में भी खर्च किए थे करीब 25 लाख
पिछले कार्यकाल में नगर निगम ने 90 पार्षदों को मुफ्त मोबाइल सेट और सिम दिए थे। इनमें 80 निर्वाचित और 10 मनोनीत पार्षद थे। मुफ्त फोन के लिए तीन सौ रुपये के मासिक प्लान का खर्च भी पांच साल तक नगर निगम ने उठाया। पांच साल पहले 3-जी मोबाइल फोन का दौर था। उस समय खरीदे गए मोबाइल की कीमत लगभग नौ हजार रुपये थी। नगर निगम ने 8.10 लाख रुपये इस पर खर्च किए। पांच साल तक बिल भुगतान करने का बोझ 16.20 लाख रुपये था। कुल मिलाकर 24.30 लाख रुपये खर्च हुए। आखिरी दो साल में नगर निगम की माली हालत इस कदर पतली हुई कि बिल भरना भारी पड़ गया। बीच में कंपनी ने पार्षदों के फोन भी बंद कर दिए।
...क्योंकि सियासत में भी शर्म बाकी है चार पार्षदों का एलान- सुविधा नहीं जनता की सेवा सर्वोपरि, नहीं लेंगे 5-जी फोन
नगर निगम की बेहद खराब माली हालत को कारण बताते हुए चार पार्षदों ने 5-जी फोन लेने से इन्कार कर दिया है। इन पार्षदों का कहना है कि उनके लिए जनता की सेवा ही सर्वोपरि है, नगर निगम से खुद नाजायज सुविधा लेने के लिए वे राजनीति में नहीं आए हैं। भूड़ की पार्षद शालिनी जौहरी ने इस बारे में नगर आयुक्त को पत्र भी लिखा है।
मैं खुद लाभ लेने के लिए नहीं, जनता की सेवा के लिए निर्वाचित हुई हूं। नगर निगम की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। ठेकेदारों के भुगतान लंबित है। सफाई व्यवस्था का बुरा हाल है। नगर निगम जनता को सुविधाएं नहीं दे पा रहा है। 5-जी मोबाइल फोन देना नगर निगम पर अतिरिक्त बोझ होगा। मैं यह फोन नहीं लूंगी। - शालिनी जौहरी, भूड़ की पार्षद
मैंने बोर्ड के पिछले कार्यकाल में भी नगर निगम की ओर से दिया गया मुफ्त मोबाइल सेट नहीं लिया था। मैं मोबाइल फोन लेने के लिए खुद सक्षम हूं। मेरे पास पहले से दो सेट हैं। इस बार भी मोबाइल सेट की सुविधा का लाभ नहीं लूंगा। कह दिया है कि मेरा नाम मोबाइल लेने वालों की सूची में शामिल न किया जाए। - सतीश कातिब, इंदिरा नगर के पार्षद
मैंने नगर निगम से पिछली बार भी मुफ्त का मोबाइल सेट नहीं लिया था। इस बार भी नहीं लूंगा। हम लोग जनता की सेवा का वादा करके पार्षद निर्वाचित हुए हैं न कि नगर निगम से सुविधाएं लेने के लिए। निगम की माली हालत ठीक नहीं है। यह खरीदारी अतिरिक्त बोझ होगी। मैं इसका भागीदार नहीं बनना चाहता। - राजेश अग्रवाल, रामपुर बाग के सदस्य
बोर्ड ने तो उपसभापति को गाड़ी-ड्राइवर और डीजल के अलावा हर पार्षद को तीन-तीन लाख के काम कराने का प्रस्ताव भा पास किया था। वह भी मिलना चाहिए। 20 हजार का एस्टीमेट तैयार कराने में पार्षदों का पसीना छूट जाता है। इस पर काम क्यों नहीं हो रहा। मैंने पिछली बार भी मोबाइल सेट नहीं लिया था। - कपिल कांत, कानून गोयान के पार्षद
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