विरोधियों को सख्त संदेश

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Edited By Amrit Vichar
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने संबोधन में भारत को संयुक्त राष्ट्र में निर्णय लेने की व्यवस्था से अलग रखने के साथ ही आतंकवाद और कोरोना लड़ाई पर महासभा पर सवाल खड़े किए तो यह भारत के विरोधियों को सख्त संदेश के साथ ही शांति चाहने वालों को साथ लेने की भी …

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने संबोधन में भारत को संयुक्त राष्ट्र में निर्णय लेने की व्यवस्था से अलग रखने के साथ ही आतंकवाद और कोरोना लड़ाई पर महासभा पर सवाल खड़े किए तो यह भारत के विरोधियों को सख्त संदेश के साथ ही शांति चाहने वालों को साथ लेने की भी कवायद दिखी।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिए अपने वक्तव्य पर जब प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 120 करोड़ लोगों के देश को निर्णय लेने की व्यवस्थाओं से कब तक अलग रखा जाएगा, तो यूएन अब इस विषय पर सोचने को मजबूर होगा ऐसा माना जा सकता है। इतना ही नहीं, पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र के पूरे ढांचे पर ही सवाल उठाते जब यह कहा कि कोरोना से जंग में यूएन की क्या भूमिका रही, तो विश्व के अन्य देशों को भी समझना होगा कि वर्षों पूर्व तात्कालिक परिस्थितियों के लिहाज से गठित एक वैश्विक संस्था के स्वरूप में बदलाव का भी अब वक्त आ गया है।

यह सही भी है कि आतंकवाद और कोरोना से लड़ाई के मामले में संयुक्त राष्ट्र की कोई ठोस भूमिका नजर नहीं आई। भारत संयुक्त राष्ट्र में लगातार यह कहता रहा है कि आतंक को पनाह देने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, क्योंकि आतंकी किसी बाहरी दुनिया में नहीं बल्कि विश्व के कुछ चुनिंदा देशों में पनाह लिए हुए हैं। यहीं से उन्हें आतंक के लिए हथियार उपलब्ध कराए जाते हैं।

पूर्व विदेश मंत्री स्व. सुषमा स्वराज ने जब महासभा को संबोधित किया था तो उन्होंने भी कहा था कि आतंकियों के पास हथियार उन्हीं देशों की मदद से आते हैं, जो आतंक को पालता-पोषता है। भारत कई बार कह चुका है कि आतंकी गतिविधियों का गढ़ रहा पाकिस्तान हमेशा भारत को घाव देता रहा है। मगर सारे सबूत और जानकारी के बावजूद आज तक संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान के खिलाफ किसी ऐसी ठोस कार्रवाई को अंजाम नहीं दिया जिससे वहां रहे आतंकी संगठनों के आकाओं पर कोई असर हो।

भारत को संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बनाने की बात करते हुए प्रधानमंत्री ने सीधे इस बात जोर दिया कि भारत संयुक्त राष्ट्र के सुधार की प्रक्रिया के पूरा होने का लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र से यह सीधा सवाल पूछा जाना आज की तारीख में लाजिमी भी है क्योंकि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ ही हमारे देश में दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है। ऐसे में आखिर भारत को यूएन का स्थायी सदस्य क्यों नहीं बनाया जा रहा है।

अब तक संयुक्त राष्ट्र में सीधे तौर पर वैश्विक मुद्दों को लेकर कभी किसी राष्ट्राध्यक्ष ने इतनी साफ और स्पष्ट बात नहीं की है। ऐसा करके प्रधानमंत्री मोदी ने साफ संदेश दिया है कि भारत विश्व शांति की किसी भी कोशिश में सबके साथ है, मगर उसके खिलाफ अगर आतंक के साथ ही यूएन में पक्षपात जैसी कोई बात होती है तो अब चुप रहने की स्थिति भी नहीं है।