रायबरेली: बकुलही झील को संवारे का नहीं हुआ प्रयास, अपेक्षा बन गई अभिशाप
संसद में गूंजी थी पौराणिक और धार्मिक महत्व के बकुलाही झील की अंतहीन दुर्दशा की गाथा
रायबरेली। बकुलाही झील आज दो जिलों के किसानों की रोटी पर संकट बन गई वहीं हजारों साल पुरानी बकुलाही झील का बड़ा पौराणिक और धार्मिक महत्व भी है। त्रेता और द्वापर की धार्मिक कथाओं में इसका उल्लेख है। श्रीराम के वन गमन मार्ग और उनसे जुड़े स्थलों को संजोकर सरकार नया आयाम दे रही है लेकिन रामायण काल की इस झील को संजोने का कोई प्रयास नहीं हुआ है।
कभी किसानों के लिए वरदान रही इस झील की उपेक्षा से यह किसानों के लिए अभिशाप बन गई । इसकी दुर्दशा की गाथा देश के संसद में भी गूंजी थी लेकिन इस झील को संजोने और संवारने के लिए धरातल पर कोई काम नहीं हुआ। गलती बकुलाही की नहीं है, गुनाह तो अन्य ने किया है। पर्यावरण के साथ खेल कर झील के अस्तित्व को बिगाड़ दिया तो साथ ही किसानों पर भी आफत ला दी है।
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रायबरेली के भरतपुर से निकली बकुलाही ड्रेन प्रदेश के प्रतापगढ़ और जौनपुर जनपद में करीब 177 किमी तक फैली हुई है। कई दशक से इसकी सफाई न होने से इसका फैलाव किसानों की जीविका को अपनी आगोश में ले रहा है।
इस झील का धार्मिक महत्व भी है, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत की कथाओं में मिलता है, बावजूद इसके इस धार्मिक महत्व की धरोहर को बचाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। करीब तीन दशक पूर्व प्रतापगढ़ जनपद के संसद रहे बड़े राजा अभय प्रताप सिंह ने इस लोकमहत्व के मुद्दे को संसद में बड़े जोर शोर से उठाया था । किंतु संसद की कार्रवाई से बाहर यह मामला जमीन पर नहीं उतर पाया है।
बकुलाही झील का धार्मिक पौराणिक महत्व
बकुलाही नदी का संक्षिप्त वर्णन वेद पुराण तथा कई धर्मग्रंथों में है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण में बकुलाही नदी का उल्लेख किया गया है। वाल्मीकि रामायण में बकुलाही नदी का वर्णन है । जब भगवान राम के वन से वापस आने की प्रतीक्षा में व्याकुल भरत के पास हनुमान जी राम का संदेश लेकर पहुंचते हैं। तब हनुमान जी से भरत जी पूछते हैं कि मार्ग में उन्होंने क्या-क्या देखा। इस पर हनुमान जी का उत्तर होता है, सो अपश्यत राम तीर्थम् च नदी बालकुनी तथा बरूठी, गोमती चैव भीमशालम् वनम् तथा। वहीं इस नदी का वर्णन श्री भयहरणनाथ चालीसा के पंक्ति क्रमांक 27 में भी है। लिखा गया कि बालकुनी इक सरिता पावन। उत्तरमुखी पुनीत सुहावन॥
आकार के कारण बदल गया नाम
बकुलाही झील को कभी नदी माना जाता था। यह अति प्राचीन वेद वर्णित नदी है। इस नदी का प्राचीन नाम 'बालकुनी' था लेकिन बाद में परिवर्तित होकर 'बकुलाही' हो गया। बताया जाता है कि इसमें बालू और पत्थर बहुतायत थे , इसीलिए इसे बालकुनी कहा जाता था ।बाद में यह बकुलाही हो गया।बकुलाही शब्द लोक भाषा अवधी का शब्द है। जनश्रुति के अनुसार बगुले की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होने के कारण भी इसे बकुलाही कहा जाता है।
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लोकसभा के उठा था बकुलाही का मुद्दा
दसवीं लोकसभा में प्रतापगढ़ से सांसद रहे राजा अभय प्रताप सिंह ने बकुलाही झील के कारण किसानों की खेती चौपट होने का मुद्दा बड़े जोर शोर के साथ उठाया था । झील की सफाई न होने के कारण इसका पानी फैलकर किसानों के खेतों में जाने लगा और धीरे धीरे हजारों एकड़ कृषि भूमि झील में तब्दील हो गई । संसद में मामला उठने के बावजूद झील की सफाई के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ ।
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