बेरोजगारी गंभीर मुद्दा

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Edited By Amrit Vichar
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आगामी दिनों में वैश्विक स्तर पर श्रम बाजार परिदृश्य और बेरोजगारी के हालात बिगड़ने की आशंका है। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के एक नए विश्लेषण के अनुसार, बेरोजगारी और रोजगार परक कामकाज में मौजूदा खाई की दर, वैश्विक महामारी से पूर्व के स्तर से कुछ कम हुई है।

इसके बावजूद वर्ष 2024 में वैश्विक बेरोज़गारी दर के बढ़ने की संभावना है। श्रम बाजार में असंतुलन बढ़ रहा है, कई और पारस्परिक वैश्विक संकटों के संदर्भ में यह कही अधिक सामाजिक न्याय की दिशा में प्रगति को कमजोर कर रहा है। बढ़ती असमानताएं और सुस्त उत्पादकता चिंता के कारण हैं।

श्रम बाजार रुझानों के आकलन में बेरोजगारी, रोजगार सृजन, श्रम बल की भागीदारी और काम के घंटे शामिल हैं, फिर उन्हें उनके सामाजिक नतीजों से जोड़ा जाता है। इस साल अतिरिक्त 20 लाख श्रमिक रोजगार बाजार में काम की तलाश में आएंगे। इस कारण वैश्विक बेरोजगारी दर 5.1 प्रतिशत से बढ़कर इस साल 5.2 प्रतिशत पर पहुंच जाएगी। अधिकांश जी-20 देशों में वास्तविक मजदूरी में गिरावट आई है, क्योंकि वेतन वृद्धि महंगाई के साथ तालमेल बिठाने में विफल रही है।

जी-20 समूह के अधिकांश देशों में इस्तेमाल करने लायक आय में कमी आई है और महंगाई बने रहने की वजह से जीवन स्तर में जो गिरावट हुई है वह जल्द सुधरने वाली नहीं है। भारत के लिए भी बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा है, जो देश के आर्थिक परिदृश्य को चुनौती देता रहता है। दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से एक के रूप में, बेरोजगारी दर में उतार-चढ़ाव का देश की वृद्धि और विकास पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। विरोधी दल कांग्रेस ने गुरुवार को आरोप लगाया कि विगत 10 वर्षों में देश में ‘नौकरियों के अकाल’ के हालात बदतर हो गए हैं।

सवाल है कि आखिर बेरोजगारी दर अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती है? बेरोजगारी दर खर्च, विकास और नौकरी के अवसरों को प्रभावित करके अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। उच्च दर आर्थिक प्रगति में बाधा डालती है और सामाजिक अशांति का कारण बन सकती है, जबकि कम दर एक संपन्न नौकरी बाजार और बढ़ती अर्थव्यवस्था का संकेत देती है। नीति निर्माता इसका उपयोग रोजगार सृजन और आर्थिक विकास के लिए रणनीतियों को लागू करने के लिए करते हैं।

भारत में पिछली और वर्तमान बेरोजगारी दर एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतक हैं। आर्थिक मंदी के दौरान जब नौकरी के अवसर कम हो जाते हैं, तो बेरोजगारी बढ़ने लगती है। इसके विपरीत भारत में आर्थिक विकास और समृद्धि की अवधि के दौरान, जनता के लिए नौकरी के कई अवसर उपलब्ध होने के कारण बेरोजगारी दर में गिरावट की उम्मीद है, जो कि राहत पहुंचाने वाले की बात है।