एमनेस्टी पर रोक
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा भारत में अपने कर्मचारियों को निकालने और सारे अभियान, अनुसंधान कार्यों को रोकने की घोषणा के बाद मानवाधिकार संस्थाओं और उनके कार्यकलाप को लेकर नई बहस छिड़ गई है। इस मामले में सरकार और संस्था के अपने-अपने तर्क हैं, मगर पिछले कई सालों से एमनेस्टी इंटरनेशनल जिस तरह …
अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया द्वारा भारत में अपने कर्मचारियों को निकालने और सारे अभियान, अनुसंधान कार्यों को रोकने की घोषणा के बाद मानवाधिकार संस्थाओं और उनके कार्यकलाप को लेकर नई बहस छिड़ गई है। इस मामले में सरकार और संस्था के अपने-अपने तर्क हैं, मगर पिछले कई सालों से एमनेस्टी इंटरनेशनल जिस तरह से मानवाधिकारों पर काम से ज्यादा सोशल मीडिया या अन्य स्थानों पर अपने बयानों से सुर्खियों में आ गई थी, उससे संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल तो खड़े होने ही थे।
एमनेस्टी इंटरनेशनल विश्व भर में मानवाधिकार के लिए काम करती है। जाहिर है विदेशी संस्था होने के नाते इसकी फंडिंग का भी कहीं न कहीं विदेशी मुद्रा से संबंध जरूर होगा। केंद्र सरकार ने संस्था के खातों को फ्रीज कर दिया था, जिसके बाद अब उसने देश में काम बंद करने का निर्णय लिया है। सरकार का तर्क यह है कि इस संस्था को अवैध रूप से विदेशी धन मिलता रहा लेिकन संस्था ने विदेशी योगदान अधिनियम के तहत कभी पंजीकरण ही नहीं कराया।
गृह मंत्रालय के मुताबिक संस्था ने भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के जरिए धन मंगाया, जिसकी गैर लाभकारी संस्थाओं को अनुमति नहीं है। प्रवर्तन निदेशालय ने 2017 में भी संस्था के खाते फ्रीज किए थे, जिसके बाद उसे सुप्रीम कोर्ट से कुछ राहत मिली थी। सीबीआई ने भी संस्था के खिलाफ केस दर्ज किया था। उधर, संस्था का कहना है कि देशभर में मानवाधिकारों को लेकर सरकार के खिलाफ प्रतिकूल रिपोर्ट के चलते सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है। सवाल यह है कि संस्था या सरकार में कौन सही है।
जाहिर है केंद्रीय एजेंसियों ने संस्था के खिलाफ तभी कोई कार्रवाई की होगी जब पूरी पड़ताल के बाद कार्रवाई योग्य साक्ष्य उसके पास होंगे। अगर, बिना साक्ष्यों के एकतरफा कार्रवाई की गई है तो यह न केवल मानवाधिकार संस्था का बल्कि मानवाधिकारों का भी उल्लंघन ही माना जाएगा। मगर संस्था को भारत में अपना काम बंद करने के बजाए यह बाद सिद्ध करना चाहिए था कि उसके खिलाफ की जा रही कार्रवाई प्रतिशोधात्मक है।
केंद्रीय एजेंसियां अगर कागजों के आधार पर संस्था के खाते फ्रीज करती हैं तो संस्था के लिए एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा तो खुला ही है, लिहाजा उसे अपने कार्य की संवेदनशीलता को समझते हुए कोर्ट जाना चाहिए था। मगर ऐसा नहीं हुआ। अभिव्यक्ति की आजादी के उसके अधिकारों के मामले में अगर केंद्र ने रोक लगाई होती तो वह निश्चित ही गलत होता, मगर विदेशी धन को लेकर लगे आरोपों का संस्था को जवाब देना चाहिए। साथ ही अपने कर्मचारियों के हितों का भी ध्यान रखते हुए देश में काम समेटने की जगह और मजबूती से आगे आना चाहिए।
