पीलीभीत: राम जन्मभूमि आंदोलन में श्याम ने भी निभाई थी अहम भूमिका, बाल्टी में राम ज्योति सुरक्षित कर गांव-गांव पहुंचाई

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वेदपाल तिवारी, बरखेड़ा/पीलीभीत। नब्बे के दशक में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में यूं तो तमाम ऐसे नायक रहे जोकि पुलिस के कड़े पहरे के बाद भी राम नाम की अलख जगाते रहे। बाद में कोई सांसद चुना गया तो कोई विधायक। कईयों को अन्य पदों पर जिम्मेदारियां भी मिली। वहीं, ऐसे युवा भी रहे जोकि प्रभु श्रीराम की आस्था से जुड़ते हुए कार सेवा में जुट गए थे। 

इन्हीं में एक नाम है तराई के जनपद पीलीभीत के छोटे से कस्बे बरखेड़ा के निवासी श्याम सक्सेना। पढ़ाई के साथ ही वह आरएसएस-भाजपा में सक्रिय कार्यकर्ता के तौर पर न सिर्फ जुड़े बल्कि राम जन्म भूमि आंदोलन में भागीदारी की और 45 दिन जेल में भी बिताए। अब अयोध्या के भव्य मंदिर में होने जा रही श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का साक्षी बनते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।

मूल रूप से कस्बा बरखेड़ा के निवासी श्याम सक्सेना के पिता स्वर्गीय पोथीराम सक्सेना संग्रह अमीन थे। नब्बे के दशक में वह कक्षा आठ या नौ में पढ़ाई कर रहे थे। इसी बीच वह आरएसएस भाजपा से भी जुड़कर राजनीति में सक्रिय कार्यकर्ता के तौर पर आ गए थे। उस वक्त श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था। पूर्व सांसद डा..परशुराम गंगवार, मास्टर गोपीकृष्ण सक्सेना समेत कई दिग्गज भी आंदोलन में बढ़-चढ़कर लगे हुए थे।  

वह पूर्व सांसद की टीम में ही शामिल थे। उन्होंने बताया कि उस वक्त राम ज्योति घर-घर पहुंचाई जा रही थी। वह सुबह से ही अपने साथी कारसेवकों संग जुट जाया करते थे। पुलिस का कड़ा पहरा रहता था। ऐसे में बाल्टी में सुरक्षित तरीके से और ज्योति को रखकर गन्ने के खेतों में होते हुए गांव=गांव और ज्योति पहुंचाई जाती थी।  

एकाध बार पुलिस ने रोक टोक की तो यह कह दिया करते थे कि बाल्टी में पानी लेकर खेतों की तरफ जा रहे है। अक्टूबर 1990 में रात को घर पर सो रहे थे कि अचानक देर रात  दबिश पड़ी और पुलिस पकड़कर पहले बरखेड़ा थाने ले गई। वहां पर पहले से पूर्व सांसद समेत कई बड़े नेता गिरफ्तार हो चुके थे। कुल 24 लोगों की उनके समेत उस वक्त गिरफ्तारी हुई थी।

दूसरे दिन सुबह पहले पीलीभीत जेल भेजा गया लेकिन वहां पर जब किन्हीं कारणों से लेने से इनकार कर दिया तो रोडवेज की बस में सवार करके गिरफ्तार किए गए 24 लोगों को बदायूं जेल भेज दिया था। फिर डेढ़ माह बाद रिहाई मिल सकी थी।  इसके बाद छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में भी कार सेवा करने गए थे।

हालांकि उस वक्त बचते बचाते घर लौट आए थे, गिरफ्तारी नहीं हुई थी। उन्होंने ये भी बताया कि उस  वक्त राम ज्योति बांटने जाने के लिए घर से बहाना बनाकर निकला करते थे। परिवार को पता लगता था तो बाद में डांट फटकार पड़ती थी। मगर अब उस वक्त के कार सेवकों के संघर्ष को ऐतिहासिक बनता देख पूरा परिवार खुश है।

प्रभात फेरियों में भीड़ जुटाया करते थे राम कुमार
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के समय लोगों को जोड़ने के लिए प्रभात फेरियां निकाली जाती थी। इनके जरिए घर-घर से लोगों को जोड़ने का काम रामभक्त किया करते थे।  प्रभात फेरियों के लिए लोगों को जोड़ने के लिए शहर के आवास विकास कॉलोनी निवासी राम कुमार शर्मा भी सक्रिय रहा करते थे। उनका निधन हो चुका है। उनके बेटे महेश शर्मा एक निजी स्कूल में क्लर्क की नौकरी करते हैं।

उन्होंने बताया कि पिता अक्सर उस वक्त के आंदोलन से जुड़ी बातें बताया करते थे। प्रभात फेरियों में खुद शामिल रहने के साथ ही लोगों को एकत्र करने की जिम्मेदारी  उन पर थी। जब वह बीमार हो गए  और स्वास्थ्य प्रभात फेरियों में जाने लायक नहीं रहा।उस वक्त भी वह भले कुछ दिन खुद नहीं गए लेकिन दूसरों में राम नाम की अलख जगाने का काम करते रहे। अब 22 जनवरी को लेकर उनका परिवार काफी खुश है। इसे भव्य दिवाली के रुप में मनाएगा।

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