संभल: चंदौसी के संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही अयोध्या जैसी रामलला की मृण्मूर्ति
पुराविद् स्व. पं. सुरेंद्र मोहन मिश्र ने सन् 1955 में मिट्टी-पत्थर की प्राचीन मूर्तियों, सिक्कों, बर्तनों, मनकों समेत हस्तलिखित ग्रंथों को संग्रहित कर बनाया था संग्रहालय
कपिल कांत शर्मा/चंदौसी, अमृत विचार। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की नगरी अयोध्या में कल श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी। 16 जनवरी से देश भर में उत्सव मनाया जा रहा है। हर कोई श्री राम की भक्ति में रंगा नजर आ रहा है। संयोग की बात है कि अयोध्या के राम-मंदिर में स्थापित रामलला की यह आधुनिक प्रस्तर मूर्ति चेहरे की बनावट और भावांकन की दृष्टि से 'पं.सुरेंद्र मोहन मिश्र संग्रहालय' में प्रदर्शित डेढ़ हज़ार वर्ष पुरानी रामलला की मृण्मूर्ति से अद्भुत साम्यता रखती है। चालीस वर्ष पहले करीब चार से पांच इंच की इस मूर्ति को जनपद बरेली के आंवला के पास अहिच्छत्र स्थान पर रामनगर किले से संग्रहित किया गया था।
22 मई 1932 को जन्मे चन्दौसी के पुराविद् स्व. पं. सुरेंद्र मोहन मिश्र ने 1955 में मिट्टी-पत्थर की प्राचीन मूर्तियों, सिक्कों, बर्तनों, मनकों और अन्य पुरावेशों के अलावा प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों को संग्रहित कर अपनी जन्मभूमि में संग्रहालय बनाया था। वर्ष 2008 में उनके निधन के बाद दिसंबर 2022 में उन्हीं की जन्मस्थली पर नवीन रुप देकर संग्रहालय स्थापित कर दिया गया। संग्रहालय देश विदेश के पुरातत्वविदों और इतिहास प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र है। पं. सुरेंद्र मोहन मिश्र के दो पुत्र बड़े पुत्र अतुल मिश्र संग्रहालय की देखरेख करते हैं। जबकि छोटे पुत्र विप्रवत्स मिश्र परिवार के साथ बरेली में निवास करते हैं।
पं. अतुल मिश्र का कहना है कि उनके पिता द्वारा स्थापित किए गए संग्रहालय में ईशा से पूर्व 2000 वर्ष से लेकर गुप्त काल तक के मिट्टी-पत्थर की प्राचीन मूर्तियों, सिक्कों, बर्तनों, मनकों समेत हस्तलिखित ग्रंथों को संग्रहित कर ये संग्रहालय बनाया गया है। संग्रहालय में रखी चार से पांच इंच की मूर्ति अयोध्या में स्थापित रामलला की मूर्ति से साम्यता रखती है। चेहरे की बनावट और मुकुट के साथ तरकश भी है।
यह एक संयोग की बात है। ये मूर्ति पिता जी ने चालीस वर्ष पहले जनपद बरेली के आंवला के पास अहिच्छत्र में रामनगर किला से संग्रहित की थी। संग्रहालय में गुप्त कालीन नारी शीर्ष, शुंगकालीन कमर की मृण्मूर्ति, शुंगकालीन मातृदेवी, ईसा से पूर्व 2000 से लेकर गुप्तकाल तक की मणि मुक्ताएं, मिट्टी के प्राचीन बर्तन, मिट्टी की अलंकृत ईटें, कुषाण कालीन महिष-मर्दिनी, कुषाण कालीन व गुप्तकालीन शीर्ष, मिट्टी की मुहरें आदि संग्रहित हैं।
संग्रहालय देखने आए थे प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन
पं. अतुल मिश्र ने बताया कि प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन तत्कालीन राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पिता सुरेंद्र मोहन मिश्र की प्राचीन खोजों से संबन्धित खबरें पढ़ कर उनका संग्रहालय देखने चन्दौसी आए थे। श्री बच्चन संग्रहालय देख कर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने दिल्ली पहुंच कर अपने पुत्र महानायक अमिताभ बच्चन से एक पत्र भी तत्कालीन शिक्षा मंत्री केसी पंत के नाम इस आशय से लिखवाया। जिसमें उन्होंने लिखा कि ये देश का सबसे बड़ा व्यक्तिगत संग्रह है।
ये रहे संग्रहालय के प्रशंसक
पं. सुरेंद्र मोहन मिश्र के संग्रहालय के प्रशंसकों में डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, सत्यकेतु विद्यालंकर, कृष्णदत्त वाजपेयी, डॉ. सतीश चंद्र काला, कैप्टन शूरवीर सिंह, महानिदेश पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग देश पांडे, एमसीसी जोशी, रमेश चंद्र शर्मा, डॉ. डब्ल्यू एच सिद्दीकी के अलावा अनेक प्रख्यात पुराविद् शामिल हैं।
चार-पांच दिन पहले मैं जब संग्रहालय में बैठा था। टीवी चैनल, अखबारों व सोशल मीडिया के माध्यम से अयोध्या में स्थापित रामलला की मूर्ति से संग्रहालय में रखी मूर्ति से मिलान किया तो संग्रहालय की मूर्ति की बनावट अयोध्या के रामलला से पूर्ण रुप से साम्यता रखती है। साथ ही पांच वर्ष आयु के बच्चे के चेहरे की दो मिट्टी की मूर्ति भी श्री राम की बाल्यावस्था से काफी मिल रही हैं।
पं. अतुल मिश्र, पुत्र संग्रहालय संस्थापक पं. सुरेंद्र मोहन मिश्र।
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