Allahabad Highcourt : निष्पक्ष सुनवाई के अभाव में मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखने से किया इनकार

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृत्युदंड की सजा के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई प्रत्येक आरोपी का अधिकार है। एक निष्पक्ष सुनवाई के अंतर्गत अभियोजन को अभियुक्त का अपराध साबित करने के लिए उचित और निष्पक्ष अवसर दिया जाता है, साथ ही अभियुक्त को अपनी बेगुनाही सिद्ध करने का पूर्ण अवसर भी दिया जाता है। कोर्ट ने आगे कहा कि जब तक अभियुक्त को खुद का बचाव करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं दिया जाता है, तब तक उसकी दोषसिद्धि और सजा को मंजूरी नहीं दी जा सकती है। जहां अभियुक्त की सहायता के लिए कोई योग्य अधिवक्ता उपलब्ध ना हो, वहां उसके साथ निष्पक्ष न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती है। ऐसे मामलों में अभियुक्त को या तो गवाहों से स्वयं जिरह करने का अवसर दिया जाए या जिरह करने के लिए न्यायमित्र नियुक्त किया जाए। 

उक्त आदेश न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्रीमती नंदप्रभा शुक्ला की खंडपीठ ने अजय कुमार की याचिका को निस्तारित करते हुए पारित किया। वर्तमान मामले में सत्र न्यायालय ने अभियुक्त के अधिकार का हनन करते हुए उसे निष्पक्ष सुनवाई से वंचित कर दिया। उसे गवाहों से जिरह न करने पर होने वाली हानि से अवगत नहीं कराया गया। इसी पृष्ठभूमि पर कोर्ट ने आरोपी को मिली मृत्युदंड की सजा को बरकरार न रखते हुए ट्रायल कोर्ट को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से 6 महीने के अंदर मुकदमे को समाप्त करने का निर्देश दिया। मालूम हो कि आरोपी के खिलाफ थाना अरवाकटरा, औरैया में आईपीसी की गंभीर धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिस पर संज्ञान लेते हुए ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 302 के तहत एक लाख रुपए जुर्माने के साथ मृत्युदंड की सजा सुनाई।

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