सत्ता और पद की चाहत रखने वाले राम को नहीं जानते : दीपक मिश्रा 

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Edited By Amrit Vichar
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लखनऊ, अमृत विचार। मेहरबानी करके तुलसी, कबीर और लोहिया के राम को मत बांटिए, राम को राम रहने दीजिए। राम ने जब लंका को जीता उस समय सब ने कहा कि आप लंका के राजा बन जाइए, लेकिन राम ने अपनी जन्मभूमि को चुना। यह असली राष्ट्रवाद है। सत्ता पाने की लालसा रखना राष्ट्रवाद नहीं है। ऐसे लोग राम को नहीं जानते हैं। राम को भी आजकल कट्टरपंथियों ने खेमों में बांट दिया है। इतना ही नहीं जो लोग सत्ता की चाहत रखते हैं, मिनिस्ट्री के लिए दल बदलते हो उन्हें तुलसी और राम पर बोलने का कोई हक नहीं है। यह कहना है समाजवादी चिंतक दीपक मिश्रा का। दीपक मिश्रा की ख्याति एक लेखक और विचारक के रूप में भी है। दीपक मिश्रा ने हिन्दी भाषा को आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ तक से लड़ाई लड़ी। गिरफ्तार हुये जेल गये, लेकिन हिन्दी को आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए आज भी उनका संघर्ष जारी है। वह रामराज्य की पैरोकारी करते हैं और रामराज्य को समाजवादी संकल्पना बताते हैं। वह डॉ. लोहिया के रामायण मेले की बात करते हैं और कहते हैं जो पार्टी डॉ.लोहिया में आस्था रखेगी, वह राम में आस्था रखेगी। अमृत विचार के संवाददाता वीरेंद्र पाण्डेय ने उनसे कई मुद्दों पर बात की जिसका उन्होंने बड़े ही बेबाकी के साथ उत्तर दिया। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश...

सवाल:  लेखन के क्षेत्र में आप कैसे आये‌‌ ?

जवाब : मन में आये हुये भाव और विचारों का रेचन करने के लिए लेखन का क्षेत्र चुना। इसके अलावा जो व्यक्ति सामाजिक जीवन संवेदना और सिद्धान्त के साथ जीता है। वह जरूर कलमकार होता है। आप महात्मा गांधी, नेहरू और डॉ. राम मनोहर लोहिया को देख लीजिए। जिन्होंने कई विषयों पर लिखा। डॉ. राम मनोहर लोहिया को लेकर लोग उनके राजनीतिक पक्ष को देखते हैं, लेकिन उनके लिए महाकवि दिनकर ने लिखा है कि डॉ. लोहिया ने हिन्दी को हमारे जैसे कई लेखकों से ज्यादा सशक्त किया है।

सवाल : डॉ. लोहिया और समाजवाद के प्रति आर्कषण कैसे बढ़ा ?

जवाब : एशिया सोशलिस्ट कान्फ्रेंस में डॉ. राम मनोहर लोहिया का प्रतिनिधित्व कर रहे रिशांग कीशिंग, जार्ज फर्नाण्डीज, रवि राय, छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र के संपर्क में आने के बाद मैं डॉ. राम मनोहर लोहिया और समाजवाद के प्रति आर्कषित हुआ और उसी समय से लोहिया मय हो गया।

सवाल : हिंदी भाषा को लेकर आपको जेल जाना पड़ा ?

जवाब : जब मैं परास्नातक कर रहा था, उस समय मुझे जानकारी हुई कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी भाषा को आधिकारिक दर्जा नहीं मिला है। इस दौरान मुझे यह भी पता चला की हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। तभी मन में एक सवाल उठा की संयुक्त राष्ट्र संघ लोकतांत्रिक पद्धति पर बना संगठन है। ऐसे में हिंदी को जगह क्यों नहीं मिली। हिंदी तो हमारी सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतीक है। यह सवाल मन में लिये करीब 1000 पत्र मैने संयुक्त राष्ट्र संघ को लिखा है,सत्याग्रह भी किया। इसी के चलते एक बार मेडागास्कर और कंबोडिया में स्थित लेबर चौक पर धरना देते समय गिरफ्तार हुआ।

सवाल: क्या आप अंग्रेजी भाषा के विरोधी हैं?

जवाब : जी नहीं, हम अंग्रेजी के खिलाफ वहां खड़े होते हैं। जहां अंग्रेजी शोषण का माध्यम बनती है। हमारा अंग्रेजी से कोई बैर नहीं है हमारे आदर्श लोहिया ने अंग्रेजी में किताबें लिखी हैं। भाषा के माध्यम से शोषण सामंतवाद को बढ़ावा देता है। मूलत: हम लोग सामंतवाद के खिलाफ हैं। यह लड़ाई भारत के सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई है।

सवाल : देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में हिन्दी कितना संघर्ष कर रही है।

जवाब : जी हां यह सच है कि देश का सबसे बड़ा सूबा होने के बावजूद हिन्दी की वह स्थिति यूपी में नहीं है जो होनी चाहिए, लेकिन धीरे-धीरे स्थित सुधर रही है।

सवाल : अंग्रेजी न आना क्या शर्म की बात है?

जवाब : अंग्रेजी का न आना अज्ञानता का परिचायक नहीं है। अंग्रेजों ने जब हमारे यहां राज किया तो सिर्फ भुगोल पर ही नहीं बल्कि हमारे मानस पर भी शासन किया। इस देश में बड़े-बड़े विद्वान हुये, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी, लेकिन दुनिया में वह विद्वता के प्रतीक हैं। तुलसी के समय में भी इस देश में अंग्रेजी आ चुकी थी, लेकिन उन्होंने अपनी भाषा में रामचरित मानस की रचना की। कबीर को अंग्रेजी नहीं आती थी। यह दोनों ही विद्वता के प्रतीक हैं। बाजार ने अंग्रेजी को स्थापित किया है। 

सवाल : देश के विकास के लिए किस भाषा की जरूरत है?

जवाब : देश का विकास देशी भाषा और देशी तकनीक से ही संभव है। आज हम प्रति व्यक्ति आय में 143 देशों से पीछे हैं। आज हम समग्र विकास में 130 देशों से पीछे हैं। राम विमर्श हमारे यहां तब खड़ा होता है जब तुलसीदास राम चरित मानस लिखते हैं। गांधी ने भी हिन्दी की पैरवी इसलिए की,क्योंकि हिन्दी हमारी जनभाषा है। जब हिन्दी की बात हो तो सिर्फ हिंदी नहीं है बल्कि हमारे देश में बोली जाने वाली सभी भाषाओं की प्रतिनिधि है। हिन्दी मजबूत होगी तो लोकतंत्र मजबूत होगा।

सवाल : आप राम विमर्श की बात करते हैं.टीबी पर राम की पैरवी करते हैं?

जवाब : मै नहीं तुलसीदास जी, बाल्मीकि जी और डॉ.राम मनोहर लोहिया मानते थे कि राम हमारे देश के आम जनमानस के देवता और प्रतिनिधि हैं।

सवाल : रामराज्य क्या है?

जवाब : तुलसीदास ने उत्तरकांड में लिखा है बयरु न कर काहू सन कोई, राम प्रताप बिषमता खोई।। यानी की जब राम का राज्य होता है, तो विषमता समाप्त होती है, सभी खुशहाल होते हैं, कोई भूखा और गरीब नहीं होता, लेकिन अभी रामराज्य की स्थापना का स्वप्न अभी पूरा नहीं हुआ है। राम को आजकल कट्टरपंथियों ने खेमों में बांट दिया है। वह राम ही हैं जिसे मशहूर शायर अल्लामा इकबाल इमामे हिन्द कहते हैं। आज हमारे देश में 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं, भूखमरी सूचकांक में भारत जैसे देश का नाम अफगानिस्तान जैसे देशों के साथ देखता हूं, तो आंसू निकलता है। 

सवाल: राम के आदर्शों पर काम करने वाली पार्टी किसे मानते हैं?

जवाब : राम,राष्ट्र और समाजवाद को दलों में क्यों बांटते हैं। समाजवाद का संकल्प भगत सिंह ने लिया था,तब कोई दल नहीं था। डॉ. राम मनोहर लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी हो या अभी की समाजवादी पार्टी राम से अलग कैसे हो सकती है। डॉ. लोहिया रामायण मेला लगाते थे। जो भी पार्टी डॉ. लोहिया में आस्था रखती है वह राम में आस्था रखती है।

सवाल : आप रामराज्य को समाजवाद से जोड़ते हैं,लेकिन आपके पार्टी के नेता रामचरित मानस पर सवाल खड़ा करते हैं?

जवाब : हमारे दल के कई नेता अन्य दलों से आये हैं। उन्होंने डॉ.लोहिया की रामायण नहीं पढ़ी, पढ़ते तो जानते। जिस चौपाई पर यह विभेद चला है। उस पर डॉ. लोहिया ने साफतौर पर कहा था कि वह वक्तव्य न तो राम का है और न ही तुलसी का। वह बात समुद्र ने कही थी। डॉ. लोहिया ने रामचरित मानस के आधार पर ही सीता राम राज्य की अवधारणा की बात की थी।

सवाल : आपने विवाह नहीं किया?

जवाब :  जिस उम्र में लड़के नौकरियों की अर्जियां देते हैं,उस उम्र में मुझे देश के लिए काम करने की सोच जाग चुकी थी। मैं उस दौर में हिन्दी की लड़ाई लड़ रहा था। समाजवाद के पर्चे लिख रहा था। इसलिए शादी नहीं की।

सवाल : आपका एक शौक क्रिकेट भी है, लेकिन उसको छोड़ दिया?

जवाब : पूरी तरह से नहीं छोड़ा, मेरा पहला सपना क्रिकेटर बनने का ही था, लेकिन माता जी ने पिटाई कर दी। इसलिए क्रिकेटर बनने का सपना टूट गया। मेरी मां ने मुझे इस तरह तराशा कि मैं आज समाज सेवा कर पा रहा हूं। यह ईमानदारी और जुनून मेरी मां की दी हुई है।

माता - पिता :  शांति मिश्रा व प्रो. जयनरायण मिश्रा

लेखन कार्य -समाजवाद और राष्ट्रीय नायकों पर 43 से अधिक पुस्तकें लिखीं।

पुरस्कार- नेल्सन मंडेला अवार्ड, झारखंड में लोहिया सम्मान, श्रीलंका में हेक्टर अभयवर्धने

 

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