Holi 2024 : यहां ढोल मंजीरा और कांसे की थाली बजाकर गाते हैं होली
संजीव वार्ष्णेय,अमृत विचार । पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण की होड़ में भले ही पर्व - त्योहारों का स्वरूप बदल रहा हो, मनाने के तौर तरीके आधुनिकता की चकाचौंध में विस्मृत हो रहे हैं लेकिन संभल जनपद के ग्रामीण अंचल में होली के मौके पर चौपाइयां निकालने की परंपरा आज भी जीवित है। होली से जुड़ी कई परंपराओं को ग्रामीण आज भी सहेजे हुए हैं।
ढोल, मजीरा और कांसे की थाली बजाने से उत्पन्न संगीत की लय संग विशुद्ध देहाती शैली में चौपाई गायन की परंपरा कुछ गांव में अब भी कायम है। ग्रामीण आज भी इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। शुक्रवार को एक नगरवासी के यहां गमी की होली पर चौपाई गायन करने वाली टीम पहुंची तो उत्सुकतावश लोगों की भीड़ जमा हो गई। टीम के सदस्यों ने पारंपरिक देहाती अंदाज में होली की चौपाई गाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
भारतीय संस्कृति में रची बसी होली के वास्तविक रंगों को उकेरती कांसे की थाली और ढोल बजाती चौपाई टोलियों की संख्या घट रही है।
दो ढाई दशक पहले तक गांवों में होली पर चौपाईयों का दौर था। आपसी प्रेम और भाईचारे बढ़ाने वाली चौपाइयों में ब्रज की प्राचीन होली की परंपरा की झलक दिखती थी। चौपाई पार्टियां फाल्गुन मास में रंगभरी एकादशी से होली के कई दिन बाद तक गमी वाले परिवारों में जाकर चौपाई प्रस्तुत करती थीं। होली के पर्व पर चौपाइयों का गायन पुरानी परंपरा रही है।
चौपाई गायन करने वाले लोगों का समूह पहले ऐसे घरों के सामने पहुंचते थे, जिनके यहां साल भर के भीतर किसी प्रियजन का निधन हो चुका होता था। ढोल मजीरा और कांसे की थाली बजा, पारंपरिक अंदाज में चौपाई गाकर होली की गमी को खत्म किया जाता था। चौपाई गायन करने वाली टोलियां अब नगरों में दिखना दुर्लभ हो गया है। शायद यही वजह रही कि नगर के एक परिवार में गमी की होली पर जब गांव जमालपुर डांडा की चौपाई गायन करने वाली मंडली पहुंची तो कौतूहलवश लोगों की भीड़ जमा हो गई।
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