केंद्र का सही निर्णय
केंद्र सरकार ने यौन अपराध जैसे संज्ञेय मामलों में एफआईआर दर्ज करना न केवल अनिवार्य किया है बल्कि एफआईआर दर्ज करने में नाकाम रहने वाले पुलिस कर्मियों पर सजा का प्रावधान कर अपराध रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी बढ़ाया है। दरअसल महिला अपराधों रोकने की दिशा में काम करने के लिए कानूनी प्रावधानों …
केंद्र सरकार ने यौन अपराध जैसे संज्ञेय मामलों में एफआईआर दर्ज करना न केवल अनिवार्य किया है बल्कि एफआईआर दर्ज करने में नाकाम रहने वाले पुलिस कर्मियों पर सजा का प्रावधान कर अपराध रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम भी बढ़ाया है। दरअसल महिला अपराधों रोकने की दिशा में काम करने के लिए कानूनी प्रावधानों को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
इस वक्त भले ही इस निर्णय के मूल में हाथरस कांड के बाद देशभर में उठा उबाल हो मगर देर से ही सही, केंद्र सरकार ने इस बारे में सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का एडवाइजरी जारी कर साफ कर दिया है कि दुष्कर्म जैसे जघन्य मामलों में अपराधी को सजा हर हाल में मिलनी चाहिए। इसके लिए किसी भी तरह की लापरवाही के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को भी सजा मिलनी चाहिए। दरअसल हमारे देश में पता नहीं क्यों अपराध के तमाम मामलों में पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी करती है।
इसके पीछे वजह यह होती है कि अपराधों की संख्या और उसका ग्राफ अपने क्षेत्र में कम से कम दिखाया जाए। किसी भी इलाके में हुए अपराधों का पैमाना दरअसल वहां दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों की संख्या ही है जिसके आधार पर तय किया जाता है कि किसी क्षेत्र में अपराध कितने हुए हैं। मगर कई बार ऐसा देखा गया है कि तमाम तरह के संगीन मामलों में भी पुलिस टालमटोल करते हुए एफआईआर दर्ज नहीं करती है। अगर ऐसा है तो अपराध हो जाने के बाद यह अपराधी का बचाव ही कहा जाएगा।
देखने में भी आया है कि कई बार पुलिस जब प्राथमिकी दर्ज नहीं करती है तो पीड़ित के न्यायालय की शरण में जाने के बाद मामला दर्ज होता है। कई बार यह भी देखा गया है कि पुलिस और अपराधियों का गठजोड़ आपराधिक मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं होने देता। पुलिस अपने स्तर से ही मामला निपटाने की कोशिश में रहती है। मगर दुष्कर्म जैसे मामलों में अगर ऐसा होता है तो यह पीडि़ता के साथ बहुत बड़ा अन्याय ही है। अपराध के कई मामले तो सामने आते हैं, मगर स्थानीय थाना स्तर पर ही मामला निपटा दिए जाने के कारण कई ऐसे मामले सामने ही नहीं आ पाते हैं।
अब चूंकि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मामलों में सख्त कार्रवाई के साथ ही केंद्र सरकार ने एफआईआर दर्ज करने के साथ ही फॉरेंसिक जांच के लिए साक्ष्य जुटाने और यौन हमले में साक्ष्य संग्रह किट और यौन अपराधियों का राष्ट्रीय डाटाबेस भी अनिवार्य इस्तेमाल में शामिल किया है, लिहाजा उम्मीद है कि इस कदम से यौन अपराध के मामलों में अब पीड़िता को न्याय जरूर मिलेगा।
