बरेली: भाजपा प्रत्याशी और सरकार ने नहीं सुनी ग्रामीणों की आवाज, चुनाव बहिष्कार
बरेली, अमृत विचार। लोकतंत्र में मतदान एक महोत्सव होता है। इसमें मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है। लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण में 19 अप्रैल को पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र के बीसलपुर के गांव पुरैना और धरलिया में लोगों ने एक भी वोट न डाल कर चुनाव का पूर्ण बहिष्कार किया। गांव वालों ने बीजेपी प्रत्याशी और उनकी सरकार ने उनकी आवाज को अनसुना करने पर यह कदम उठाया।
मामला यह है कि गांव पुरैना से पेहना तक देवहा नदी पर पुल स्वीकृत हुआ लेकिन गत वर्ष विधायक विवेक वर्मा और लोक निर्माण विभाग मंत्री जितिन प्रसाद ने राजनीतिक कारणों और निहित स्वार्थ के लिए स्वीकृत स्थान से लगभग चार-पांच किलोमीटर दूर दूसरे गांव में पुल का शिलान्यास कर निर्माण शुरू करा दिया। तब पुरैना और कई गांवों के लोगों ने देवहा नदी पर धरना प्रदर्शन किया और जिलाधिकारी पीलीभीत से शिकायत दर्ज कराई।
जिलाधिकारी ने लोकनिर्माण विभाग के इंजीनियरों से वार्ता कर सच्चाई जान कर पुल गांव पुरैना से पेहना तक बनवाने का आश्वासन दिया। ग्रामीणों का प्रतिनिधि मंडल मंत्री जितिन प्रसाद से भी मिला तो उन्होंने ने भी स्वीकार किया कि शिलान्यास गलत स्थान पर हुआ है और पुरैना से पेहना तक ही पुल बनवाने का आश्वासन दिया, किंतु फिर भी पुल गलत स्थान पर ही बनना शुरू हो गया। ग्रामीण अपने हक की लड़ाई के लिए विधायक विवेक वर्मा के आवास पर छह माह में दो बार धरने पर बैठे तो उन्होंने भी गलती स्वीकार की और पुल गांव पुरैना में बनवाने का आश्वासन दिया।
इस दौरान ग्रामीणों का प्रतिनिधि मंडल लगभग छह-सात बार मंत्री जितिन प्रसाद से मिलने शाहजहांपुर और लखनऊ गया। किंतु मंत्री ने मुलाकात करने से इन्कार कर दिया। इसके बाद भी ग्रामीणों ने प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार से पत्राचार किया लेकिन कोई हल नहीं निकला। न्याय पाने के लिए
ग्रामीण लगातार प्रयास करते रहे। जब गांव वालों को प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और सरकार से कोई न्याय नहीं मिला तो चुनाव बहिष्कार की सूचना चुनाव आयोग को पहले ही दे दी थी।
चूंकि ग्राम पुरैना देवहा नदी के किनारे बसा हुआ गांव है जो शैक्षिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा हुआ था लेकिन अब वहां भी राजनीतिक हक की लड़ाई के लिए जमीन तैयार हो गई है जिसमें युवा पीढ़ी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही है। हालांकि इस पूरे आंदोलन के नेतृत्वकर्ता कृषक हरीश गंगवार को जनप्रतिनिधियों से झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकियां दी जाती रहीं किंतु वह अपने हक की लड़ाई लड़ने पर अडिग रहे।
19 अप्रैल से एक-दो दिन पहले पुलिस अधिकारियों ने भी हरीश गंगवार और गांव वालों को चुनाव बहिष्कार के खिलाफ धमकाने की कोशिश की लेकिन ग्रामीणों की दृढ़ता और एकता के आगे वह भी अपनी कोशिश में विफल रहे। गांव पुरैना में अपने हक के लिए प्रशासनिक अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों और सरकारों से न्याय पाने में विफल रहने पर हताश-निराश ग्रामीणों ने लोकतंत्र के पर्व मतदान का सफलता पूर्वक बहिष्कार किया।
चुनाव का बहिष्कार जन प्रतिनिधियों एवं सरकारों के खिलाफ एकजुटता का आंदोलन है जिससे आमजन की लड़ाई की नई जमीन तैयार हो गई है। चुनाव के बाद अक्सर सरकार तो बदल जाती है किंतु बदले हुए जनप्रतिनिधियों एवं सरकारों के चरित्र एवं चाल-चलन पहले की सरकारों की तरह मिलते-जुलते ही होते हैं। न्याय पाने के लिए जन आंदोलनों की आवश्यकता होती है जो अपना हक पाने के लिए अपनी आवाज उठा सकें। - डॉ. रजनीश गंगवार, एमजीएम इंटर कॉलेज बहेड़ी
यह भी पढ़ें- Bareilly News: मातृत्व सुख न पाने में महिलाएं ही नहीं पुरुष भी जिम्मेदार
