Loksabha election 2024: मुफ्त राशन... बंधन तो है लेकिन इतना भी मजबूत नहीं कि टूटे न
शब्या सिंह तोमर, बरेली, अमृत विचार। बसपा प्रमुख मायावती इस बार अपनी हर चुनावी जनसभा में यह समझाना नहीं भूल रही हैं कि उन्हें जो मुफ्त राशन सरकार से मिल रहा है, वह कोई एहसान नहीं है। यह राशन उन्हें उन्हीं के टैक्स के पैसे से दिया जा रहा है। बसपा प्रमुख का मुफ्त राशन को अपने भाषण के मुख्य मुद्दों में शामिल करना यूं ही नहीं है।
दरअसल यही मुद्दा है जो पिछले चुनावों में उनके कैडर वोटों को ले उड़ा। बसपा सुप्रीमो का यह पैतरा अंतत: क्या गुल खिलाएगा, यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा लेकिन इतना भर असर अभी से दिखने लगा है कि मुफ्त राशन पाने वालों के सुर बदलने लगे हैं।
पिछले कुछ चुनावों में एक लाभार्थी नाम से एक नए वोट बैंक की ईजाद हुई और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने वालों की गिनती सत्ताधारी दल के वोट बैंक में की जाने लगी। सर्वाधिक लाभार्थी मुफ्त राशन लेने वाले हैं, लिहाजा माना जाना लगा कि उनके दम पर चुनाव में बड़ा खेल किया जा सकता है। यही वजह रही कि पिछले कई चुनावों में मुफ्त राशन का मुद्दा जोरशोर से गूंजा।
मुफ्त राशन कितने वोटरों को खींचकर सत्ताधारी दल के पाले में लाया, इसका तो कोई आंकलन मुश्किल है लेकिन जिस तरह बसपा और कांग्रेस के वोटों में चुनाव दर चुनाव भारी कमी आई, उसके पीछे इसी की भूमिका मानी गई। बसपा के नेता भी यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखा रहे कि करीब 17 फीसदी दलित मतदाताओं वाले बरेली संसदीय क्षेत्र में बसपा का वोट प्रतिशत विधानसभा चुनाव 2022 में घटकर 5.8 प्रतिशत रह जाने के पीछे कहीं न कहीं यही फैक्टर रहा।
मुफ्त राशन लेने वालों से बात करने पर पता चलता है कि इन लाभार्थियों पर कुछ हद तक अब भी दो जून की रोटी देने वाली इस गारंटी का प्रभाव है, हालांकि काफी लाभार्थियों की जुबां पर उन्हीं के टैक्स के पैसे उन्हें राशन दिए जाने जैसी बातें भी जोर पकड़ने लगी हैं जैसा कि बसपा प्रमुख मायावती उन्हें समझाने की कोशिश कर रही हैं। ये लोग तर्क देने लगे हैं कि मुफ्त राशन से उन्हें जितनी सहूलियत नहीं मिल रही है, उससे ज्यादा कहीं महंगाई की मार झेलनी पड़ रही है। ऊपर से रोजगार की कमी भी बहुत भारी पड़ रही है।
पात्र गृहस्थी और अंत्योदय योजना के तहत मिलता है मुफ्त राशन
बरेली जिले में कुल मिलाकर फिलहाल 7,85,001 राशन कार्डधारक हैं। इनमें पात्र गृहस्थी के 6,85,432 कार्ड हैं जिनमें लाभार्थियों की कुल संख्या 29,66,565 है। अंत्योदय राशन कार्डों की संख्या 99569 ही है जिनमें लाभार्थी 3,03,364 हैं। पात्र गृहस्थी के राशन कार्ड पर प्रति यूनिट दो किलो गेहूं और तीन किलो चावल दिया जाता है।
अंत्योदय राशनकार्ड पर 14 किलो गेहूं और 21 किलो चावल दिया जाता है। राशन कार्ड धारकों की शिकायत है कि कुछ समय से उन्हें गेहूं के बदले बाजरा दिया जा रहा है। भीषण गर्मी में गर्म तासीर वाला बाजरा खाना मुमकिन नहीं है, इसलिए उन्हें मुफ्त राशन योजना का ज्यादा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
विधानसभा चुनाव 2022 से पहले मिला था मुफ्त रिफाइंड, चना और नमक भी
कोविड के दौर के बाद राज्य सरकार ने राशनकार्ड धारकों को मुफ्त रिफाइंड, चना और नमक भी देना शुरू किया था जिसे विधानसभा चुनाव होने के बाद बंद कर दिया गया। पूर्ति विभाग के मुताबिक इसके अलावा एक राशन कार्ड पर तीन महीने में एक बार तीन किलो चीनी भी दी जाती है।
जनगणना न होने से पुराने लक्ष्य जारी
नहीं बन पा रहे हैं नए राशन कार्ड
देश में 2011 के बाद जनगणना नहीं हुई है जिसकी वजह से राशन योजना के लाभार्थियों के नए लक्ष्य भी तय नहीं हुए हैं। करीब 12 साल से उसी लक्ष्य के आधार पर राशन कार्ड धारकों की संख्या स्थिर रखी जा रही है जो 2011 की जनगणना के आधार पर निर्धारित किया गया था। इस वजह से जब कोई पुराना राशन कार्ड निरस्त होता है, तभी उसके बदले कोई नया राशन कार्ड बनाया जाता है। आवेदनों की संख्या इसकी तुलना में सैकड़ों गुना ज्यादा है। लोग चक्कर काटते रहते हैं लेकिन उनके राशन कार्ड नहीं बन पाते।
मुफ्त राशन पर करो सवाल तो सुनाते हैं महंगाई के कष्ट
मुफ्त राशन से मेरे घर की जरूरतें पूरी नहीं होतीं, न मैं यह मानता हूं कि इस राशन के बदले मुझे वोट देना चाहिए। कोई अपनी जेब से तो हमें राशन देता नहीं है। डायरेक्ट या इनडायरेक्ट ढंग से हमारा ही पैसा होता है। कोई और सरकार आएगी तो वह भी राशन देगी ही। राशन नहीं तो रोजगार देगी जो हमारे लिए ज्यादा अच्छा होगा। - ललित मोहन, जाटवपुरा
मुफ्त राशन के बजाय ज्यादा जरूरी है कि महंगाई और बेरोजगारी कम की जाए। वैसे भी कोटेदार राशन में कटौती कर लेते हैं और उससे परिवार का पेट नहीं भरा जा सकता। मुझे मायावती की यह बात भी सही लगती है कि हमारे ही टैक्स के पैसे से हमें राशन दिया जा रहा है। वोट हमारा अधिकार है, राशन के बदले नहीं देंगे। - वीरेंद्र कुमार, जाटवपुरा
मैं अकेला आदमी हूं, मुफ्त राशन के नाम पर मुझे सिर्फ एक किलो गेहूं मिलता है जिसे कोई पीसता भी नहीं है।मेरे जैसे हजारों गरीब हैं जिनका मुफ्त राशन से कोई भला नहीं होता। पहले गैस सिलेंडर सस्ता था। जो आदमी मुफ्त राशन की उम्मीद करता है, वह सिलेंडर कैसे भरवाए। राशन के बदले वोट देने की मंशा कतई नहीं है। - महेश,वीर भट्टी
मुफ्त राशन से गरीबों को सहूलियत जरूर है लेकिन यह उन पर कोई उपकार नहीं है, यह हमारे ही टैक्स के पैसे से मिलता है और हमारा हक भी है। दूसरी बात यह है कि मुफ्त राशन से हमारी सारी जरूरतें तो पूरी नहीं होतीं। इसके बजाय महंगाई कम हो जाए तो ज्यादा अच्छा रहेगा। कई और जरूरतें खुद पूरी हो जाएंगी।- अंकुश, जाटवपुरा
राशन के बदले वोट की राजनीति नहीं होनी चाहिए। राशन गरीब का हक है और वोट उसकी अपनी पसंद। मुफ्त राशन से कोई ज्यादा फायदा भी नहीं हो रहा है। पहले कुछ दिन चल जाता था लेकिन अब नहीं चल रहा है। सरकार को चाहिए की महंगाई कम कर शिक्षा का स्तर ऊंचा करे तो काफी समस्याएं खुद हल हो जाएंगी। - धर्मेंद्र,जाटवपुरा
क्या बात करते हैं, पांच किलो राशन के बदले महंगाई बढ़ाकर हमसे पांच गुना पैसा जेब से निकलवाया जा रहा है और फिर हम उसके बदले वोट दे दें। मैं मुफ्त राशन लेता हूं लेकिन इससे मेरे घर के खर्चों की भरपाई तो होती नहीं। आयुष्मान के लिए कहा जाता है कि छह लोग हों तो सुविधा मिलेगी। यह बाधा हटाई जानी चाहिए। - मोहम्मद हबीब, जाटवपुरा
मुफ्त राशन से मेरे परिवार की जरूरतें पूरी नहीं होतीं। ले इसलिए लेते हैं क्योंकि महंगाई में इतना ही सहारा बहुत लगता है। महंगाई कम करके रोजगार की सुविधा भी दे दी जाए तो वह मुफ्त राशन से ज्यादा बढ़ा सहारा होगा। अगर सरकार राशन के बदले वोट चाहती है तो यह भी कहे कि वोट के लिए मुफ्त राशन दे रही है। - राजू, वीरभट्टी
हमें छह किलो राशन मिलता है लेकिन क्या इतने राशन में पूरा महीना चल सकता है। पहाड़ सी जरूरतों के आगे यह थोड़ा सा सहारा है। गरीब को टैक्स में कौन छूट मिल जाती है, इनकम टैक्स छोड़कर वह भी सभी टैक्स देता है। उसी से राशन मिलता है। हमें रोजगार चाहिए, प्राइवेट नौकरी में भी आरक्षण चाहिए।- रमेश, वीरभट्टी
मेरी नजर में वोट देने का आधार देश का विकास होना चाहिए, थोड़ा सा मुफ्त राशन नहीं। किसी को इतना भी मुफ्त राशन नहीं मिलता कि उसके परिवार का पेट भर जाए। इस चुनाव में मेरा मुद्दा है कि सरकार को निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में रोजगार के मौके खोलने चाहिए ताकि हर आदमी को आत्मनिर्भरता हासिल हो। - स्नेहा, वीरभट्टी
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