जांच के स्तर पर प्रक्रियागत नियमों का पालन न करना दंड आदेश की वैधता पर प्रश्नचिन्ह :हाईकोर्ट 

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक न्यायिक अधिकारी के मामले पर विचार करते हुए कहा कि किसी दोषी अधिकारी के खिलाफ जांच के स्तर पर प्रक्रियागत आवश्यकताओं का पालन न करना दंड आदेश की वैधता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। यह जरूरी है कि अनुशासनात्मक प्रक्रिया इस तरह से की जाए कि प्रभावित पक्षकारों को अपना मामला प्रस्तुुत करने, आरोपों का जवाब देने और खुद का बचाव करने का उचित अवसर मिले। उक्त आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश की खंडपीठ ने सिविल न्यायाधीश पंकज की याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किया। 

याची को सिविल जज के रूप में जिला मऊ में नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति सेवा सरकारी कर्मचारी (सेवा और आचरण) नियम, 1956, और यूपी सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियम, 1999 के तहत की गई थी। सेवा में भर्ती होने के तुरंत बाद उन्हें सोशल मीडिया पर प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित प्रश्नों वाले शिकायतकर्ता के कई संदेश मिले। इसके बाद 26 दिसंबर 2018 को शिकायतकर्ता ने याची के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई, जिसका जवाब जनवरी 2019 में याची द्वारा दिया गया, फिर भी याची के खिलाफ आरोप पत्र जारी किया गया और जिला न्यायाधीश, मऊ को याची के मामले में जांच अधिकारी नियुक्त किया गया। 

आरोप पत्र में याची पर यह आरोप लगाया गया कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में मदद करने के बहाने उन्होंने शिकायतकर्ता के साथ दुष्कर्म किया। हालांकि याची ने अपने जवाब में आरोपों से इंकार किया और शिकायतकर्ता के बारे में तथ्य रिकॉर्ड पर लाए। इसके बाद दिसंबर 2019 में याची को दुष्कर्म के मुख्य आरोप से मुक्त कर दिया गया, लेकिन 13 मई 2022 को याची के खिलाफ आक्षेपित आदेश पारित किया गया। याची के अधिवक्ता का तर्क है कि प्राधिकारियों द्वारा याची को मुख्य आरोपों से मुक्त कर देने के बाद बिना कोई स्पष्ट कारण बताए आक्षेपित आदेश पारित किया गया। अंत में कोर्ट ने निष्कर्ष दिया कि विभागीय कार्यवाही अर्ध-न्यायिक प्रकृति की थी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए था। अनुशासनात्मक प्राधिकारी को प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर अनुमान लगाकर निष्कर्ष पर पहुंचने का अधिकार है जबकि वर्तमान मामले में जांच अधिकारी के समक्ष कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। 

याची ने जिला न्यायाधीश, मऊ द्वारा जारी नोटिस और आरोप पत्र के जवाब में आरोपों से स्पष्ट रूप से इनकार किया था, लेकिन आश्चर्यजनक ढंग से बिना किसी साक्ष्य के जांच अधिकारी ने प्रासंगिक और बाहरी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए याची को दुष्कर्म के विशिष्ट आरोप से मुक्त करने के बाद एक प्रतिकूल टिप्पणी कर दी। इसके अलावा शिकायतकर्ता संबंधित निकाय के समक्ष याची के विरुद्ध लगाए गए आरोपी को सिद्ध करने के लिए उपस्थित भी नहीं हुई। अतः जांच अधिकारी द्वारा याची के विरुद्ध प्रतिकूल टिप्पणी करना उचित नहीं है।

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