बरेली: इलेक्ट्रिक रिक्शा के दौर में साइकिल रिक्शा हो रहे बदहाली का शिकार

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Edited By Amrit Vichar
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मोनिस खान/बरेली, अमृत विचार। शहर की सड़कें भी इन दिनों तंग सी हैं, इलेक्ट्रिक रिक्शा से मेरी इक जंग सी है... आज सड़कों पर हर तरफ ई-रिक्शा का साम्राज्य नजर आता है। मैं बूढ़ा हो चुका हूं। हर शख्स जल्दी में है, इसलिए धीरे-धीरे रेंगने वाले मुझ साइकिल रिक्शा को कोई नहीं पूछता। रोड किनारे नजरंदाज से खड़े साइकिल रिक्शा मानो कुछ यही दर्द बयां करते नजर आते हैं।

एक जमाना था जब शहर की तंग गलियों में जाने को साइकिल रिक्शा के सिवा दूसरी कोई सवारी नहीं थी। कुतुबखाना से किला जाना हो या शहामतगंज या फिर जंक्शन से शहर के अलग-अलग कोनों में कहीं जाना हो तो लोग साइकिल रिक्शा को तरजीह देते थे। उस समय ई-रिक्शा जैसी कोई चीज नहीं थी। 10, 20, 30 रुपये में आप शहर में एक से तीन किलोमीटर तक आराम से आवाजाही कर सकते थे। कुछ एक इलाकों को छोड़कर जाम की समस्या नहीं थी, मगर वक्त बदलने के साथ ई-रिक्शा आया और अपने साथ जाम की समस्या भी ले आया। 

शहर का शायद ही कोई प्रमुख कोना होगा, जहां ई-रिक्शा की वजह से जाम नहीं लगता। इन ई-रिक्शाओं ने साइकिल रिक्शा चालकों का रोजगार भी छीन लिया। खासतौर से उन गरीब बुजुर्गों का, जिनके बाजू अब इस हालत में नहीं कि वो बुढ़ापे में ई-रिक्शा को संभाल सकें, न ही उनके पास इसे खरीद पाने के लिए पैसा ही है। यही वजह है कि आज साइकिल रिक्शा चलाने वाले बुजुर्ग ही अधिक बचे हैं। इस उम्र में ई-रिक्शा चलाने के सवाल पर अधिकतर बुजुर्गों की अपनी मजबूरी भरी कहानी है।

रिक्शा पर कलाकृतियां उकेरने वाले भी परेशान
मोहल्ला भूड़ निवासी नदीम बताते हैं कि पिता से विरासत में रिक्शा पर कलाकृतियां उकेरने का काम मिला था। पांच सालों से काम लगभग बंद हो चुका है। लिहाजा घरों में पेंटिंग व वॉल टेक्सचर का काम करते हैं। वह बताते हैं कि शायद ही कोई फिल्म अभिनेता या अभिनेत्री होगी, जिसकी पेंटिंग उन्होंने रिक्शा पर नहीं बनाई।

खत्म कर दिए गए रिक्शा स्टैंड
शहर में आज साइकिल रिक्शा वालों के सुस्ताने को एक अदद रिक्शा स्टैंड तक नहीं है। किसी जमाने में जिला अस्पताल के सामने, जंक्शन पर, मालगोदाम रोड पर रिक्शा स्टैंड हुआ करते थे। अब स्मार्ट सिटी में रिक्शा के लिए मानो कोई जगह ही नहीं। लिहाजा अक्सर रिक्शा चालक किसी दीवार के सहारे या फिर किसी पेड़ की छाया में सुस्ताते नजर आते हैं।

कुछ इस तरह बयां किया दर्द
हमारी रिक्शा पर सवारियां जल्दी बैठना नहीं चाहतीं। कोई अगर बैठ भी जाए तो ठीक किराया भी नहीं देता। हालत यह है कि 300 रुपये भी दिन में कमा लिए तो बहुत बड़ी बात है। ऐसे में परेशानी का जीवन बिताना पड़ रहा है। -नसीर, हजियापुर

रिक्शा पर सवारियां बैठना ही नहीं चाहती हैं। स्कूल की छुट्टी होती है तो बाहर आकर खड़े हो जाते हैं, यह सोचकर कि शायद कोई हमारे रिक्शा पर भी बैठ जाए। सवारियां न मिलने से बहुत मुश्किल खड़ी हो गई है। -भूरा, जोगी नवादा

मैं 30 साल से रिक्शा चला रहा हूं, लेकिन इतना बुरा दौर कभी नहीं देखा। कोई और हुनर भी नहीं आता। ऊपर से बुढ़ापा चल रहा है। ऐसे में घर चलाने के लिए रिक्शा चलाना जरूरी है, पर सवारियां ही नहीं बैठना चाहतीं। -धीरेंद्र, देवचरा

करीब 20 साल हो गए रिक्शा चलाते हुए। आठ लोगों का परिवार है और मैं अकेला कमाने वाला हूं। लोग बैटरी वाली रिक्शा में ज्यादा बैठना चाहते हैं। ऐसे में हमारे सामने काफी मुश्किल की स्थिति पैदा हो गई है। -विक्की, नवादा शेखान

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