सीतापुर: गांजर का जिमीकंद सऊदी अरब में बढ़ा रहा खाने का स्वाद

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Edited By Amrit Vichar
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सीतापुर, अमृत विचार। हर वर्ष गांजर में घाघरा और शारदा नदियां अपना कहर बरपाती है। जिससे सैकड़ों परिवारों के घर और हजारों बीघे कृषि योग्य जमीन घाघरा और शारदा नदी के गर्भ में समाहित हो जाती है। गांजर के लोग इन नदियों का दंश हर वर्ष झेलते है। वहीं गांजर के किसान कुछ नई खेती कर एक नया कीर्तिमान रच रहे है।

विकास खंड रेउसा के ग्राम पंचायत सिकौहा गांव के किसान शरद त्रिपाठी ने गौमूत्र, गोबर सीरा से मिश्रित तैयार घंगसीवामृत बीजामृत आदि खादों का इस्तेमाल कर अपनी किसानी को संवारने में जुटे है। किसान शरद त्रिपाठी ने पहले पपीते की खेती से शुरुआत की। जिससे उन्हें लाभ मिलता गया और इन्होंने धीरे-धीरे केला, मिर्चा, टमाटर, लौकी, कद्दू, जिमीकंद आदि की खेती करने का मन बना लिया। 

किसान शरद त्रिपाठी ने बताया कि इन फसलों की खेती करीब बीस वर्षों से की जा रही है हालांकि तीन चार वर्षों से जिमीकंद की खेती भी की जाती है। जिमीकंद की खेती करने में एक एकड़ में 25 कुंतल बीज मेड़ बनाकर पौधे से पौधे की दूरी दो फिट और कतार की दूरी तीन फिट पर बोया जाता है। यह बीज फरवरी माह के अंतिम सप्ताह से लेकर मार्च के अंतिम सप्ताह तक बोया जाता है। एक एकड़ में लगभग डेढ़ लाख रुपये की लागत लगती है। जिमीकंद को सूरन के नाम से भी जाना जाता है। सर्वप्रथम कुमारगंज सिटी से गजेंद्र प्रजाति बीज लाया गया था। मेरे द्वारा बीज छह हजार रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से गुजरात , मध्य प्रदेश, पंजाब व यूपी के कई जिले में बेचा गया है।

गत वर्ष सऊदी अरब भी एक सौ पैंसठ कुंतल जिमीकंद साढ़े तीन हजार रुपये प्रति कुंतल में भेजा गया था। इसकी बिक्री लोकल मंडी में दीपावली के दरमियान हो जाती है। जिन किसानों को जिमीकंद के बीज की जरूरत होती है। जो किसान सम्पर्क करते है सम्पर्क करने पर उन्हें फरवरी और मार्च में बीज दे दिया जाता है। एक एकड़ में करीब चालिस से पचास कुंतल पैदा होता है। इस बार क्षेत्रीय किसान इसकी खेती करने के लिए बीज लेकर गए है। 

जिमी कंद की खेती के साथ-साथ वह काली हल्दी व बांस की खेती भी करते है। जिसमें बांस की कई प्रजाति है जैसे साबरमती, बालकुंआ, ब्लग्रीस आदि की खेती जाती जा रही है। साबरमती बांस की लम्बाई साठ से सत्तर फिट लम्बाई होती है और ब्लग्रीस बांस की लम्बाई नब्बे फिट होती है। काली हल्दी के पत्तियों व गाठों से तेल निकलता है। जिसका तेल बिक्री किया जाता है। काली हल्दी का तेल बाबा राम देव को भी दिया जा चुका है। उन्होंने बताया कि उन्हें खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा पुरुस्कृत भी किया जा चुका है।।

जिमीकंद के बीज की विदेशों में की जा रही मांग 
विकास खंड रेउसा के ग्राम पंचायत सिकौहा में ऑर्गेनिक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी का गठन किया गया है। कंपनी की ओर से जैविक गांव पर काम किया जा रहा है। जिमीकंद का कई दवाइयां में प्रयोग किया जाता है। इसकी मांग विदेशों तक है।

क्षेत्रीय किसानों ने खरीदा जिमीकंद का बीज 
तीन से साढ़े तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से बीज की बिक्री हो रही है। इस बार क्षेत्रीय किसानों ने सम्पर्क करके बीज लेकर गए हैं।इसकी एक एकड़ में चालिस से पचास कुंटल के हिसाब से पैदावार होती हैं। 

बांस के कई प्रजातियों की जा रही खेती
साबरमती, बालकुआँ, ब्लग्रीस आदि प्रजाति वाले बांस की खेती की जा रही हैं। इसमें साबरमती बांस की लम्बाई साठ से सत्तर फिट तो ब्लग्रीस की लम्बाई नब्बे फिट होती हैं। जिसका बांस चार सौ रूपये की दर से एक बांस बिक्री किया जाता हैं

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