खूनी मांझे का खेल : मांझे से पंतग नहीं, कट रही जीवन की डोर
अमृत विचार, लखनऊ। खुले आस्मां में पतंगों से पेंच लड़ाने वाला मांझा डोर नहीं है, बल्कि इसे खूनी मांझा कहें तो यहग गलत नहीं है। इस मांझे की चपेट में आने से तमाम राहगीरों की गर्दन कट चुकी है। शनिवार को हजरतगंज कोतवाली अंतर्गत विधानसभा के समीप मांझे की चपेट में आने से एक स्कूटी सवार की गर्दन कट गई। चौराहे पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने स्कूटी सवार को जख्मी हालत में सिविल अस्पताल में भर्ती कराया है।
प्रभारी निरीक्षक विक्रम सिंह के मुताबिक, हुसैनगंज निवासी लॉन्ड्री संचालक सोनू उर्फ दिलीप निशातगंज से चारबाग की तरफ स्कूटी से जा रहा था। विधानसभा के पास सोनू की गर्दन पतंग का मांझा उलझ गया। जिससे उसकी गर्दन धारदार मांझे से कट गई। गर्दन कटने के बाद लॉन्ड्री संचालक अचानक सड़क पर गिर पड़ा। उसकी गर्दन से खून निकलता देखता मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने फौरन रुमाल लगाकर खून रोकने की कोशिश की। इसके बाद स्कूटी सवार को ई-रिक्शा में बैठकर कर सिविल अस्पताल में पहुंचाया गया। सिविल अस्पताल के चिकित्सक डॉ.सचिन ने बताया कि मरीज को अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया गया है। धारदार मांझे से लॉन्ड्री संचालक का गला करीब 12 सेन्टीमीटर तक कट गया है। अगर जख्म गहरा हो जाता तो सांस नली प्रभावित हो जाती। फिलहाल, मरीज की हालत खतरे से बाहर है। वहीं, लॉन्ड्री संचालक के भांजे पप्पू ने बताया कि मामा की निशातगंज में दुकान है। मांझे से मामा की गर्दन गंभीर रुप से जख्मी हो गई है। जिससे काफी खून बह गया है।
स्वतंत्रता दिवस से पहले बिकने लगाता है मांझा
दरअसल, राजधानी में स्वतंत्रता दिवस पर पतंगबाजी का खेल शुरू होता है, जोकि, दीपावली तक चलता है। ऐसे में शहर भर में मांझे की ब्रिकी जोर पकड़ने लगती है। सूत्रों की मानें तो, पुराने लखनऊ में कुछ दुकानों में प्रतिबंधित मांझे की ब्रिकी होती है। पुलिस ने कई बार पतंग की दुकानों में प्रतिबंधित मांझे की ब्रिकी करने वालों के खिलाफ अभियान चलाया, लेकिन समय के साथ यह अभियान भी ठंडे बस्ते में चला गया है। ज्यादातर पुराने लखनऊ में मांझे से राहगीरों की गर्दन कटने की घटनाएं सामने आती हैं। इनमें चौक, वजीरंगज, सआदतगंज, नक्खास, रकाबगंज, अमीनाबाद, नाका, गणेशगंज और कैसरबाग के क्षेत्र पतंगबाजी के लिए जाने जाते है।
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