बरेली: फिर याद आई पुरानी कहानी...मरी खाल से तो लोहा भी भस्म हो जाता है, 'मैं तो जिंदा हूं'

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सुरेश पाण्डेय, बरेली। अपने राजनीतिक जीवन का आखिरी साल संतोष गंगवार के लिए सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव से भरा रहा। लोकसभा चुनाव में उनका टिकट कटने के बाद जो हुआ, उसकी यादें उन्हें झारखंड का राज्यपाल बनाने की घोषणा के साथ फिर ताजा हो गईं।

इसी साल मार्च में क्षोभ, व्यथा और गुस्से से भरा कथन 'मरी खाल से तो लोहा भी भस्म हो जाता है, मैं तो जिंदा हूं' चर्चा में आया था, अब उनके राज्यपाल बनने के बाद साबित भी हो गया कि जिन लोगों ने संतोष गंगवार को राजनीतिक रूप से चुका मान लिया था, वह उनका मुगालता था।

राजनीति वैसे तो उतार-चढ़ाव का ही नाम है लेकिन संतोष गंगवार की राजनीति में यह सब ज्वार-भाटे की तरह लोकसभा चुनाव-2024 से पहले शुरू हुआ। उनका टिकट कटा तो पार्टी में ही कहा जाने लगा कि पार्टी के ही कुछ लोगों ने उनकी राजनीति को खत्म करने के लिए यह कुचक्र रचा है। गरमाए सियासी माहौल में आमतौर पर शांत रहने वाले संतोष गंगवार के खिलाफ की गई साजिशें भी स्पष्ट रूप से सामने आने लगीं। आखिरकार नौबत यहां तक पहुंची कि शांत रहने वाले संतोष गंगवार भी उबाल खा गए।

दो अप्रैल को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पीलीभीत और बदायूं के बाद बरेली में प्रबुद्ध सम्मेलन था। इससे पहले 29 मार्च को बरेली के कई नेता पुलिस और प्रशासन के अफसरों के साथ बरेली कॉलेज मैदान में व्यवस्था देखने पहुंचे थे। बातचीत चल रही थी।

इसी बीच शहर के एक नेता पहुंचे तो उन्हें देखते ही वरिष्ठ नेता का चेहरा तमतमा गया और वह बिफर पड़े। अफसरों और नेताओं के बीच ही उन्होंने उन पर उनके टिकट को लेकर माहौल बिगाड़ने का आरोप लगाया। स्थानीय नेतृत्व पर भी विरोध में माहौल बनाने में शामिल होने की बात कहकर नाराजगी जताई थी। तभी यह कथन भी चर्चा में आया कि मरी हुई खाल से लोहा भस्म हो जाता है, मैं तो जिंदा हूं।

सर्किट हाउस में रविवार को भी उस कथन की पार्टी के लोगों के बीच खूब चर्चा रही। नेताओं का कहना था कि राजनीति में कब बाजी पलट जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। यह बाजी इतनी जल्दी पलट जाएगी, इसकी उम्मीद नहीं थी। गृह मंत्री अमित शाह बरेली दौरे के समय संतोष गंगवार को बड़ी जिम्मेदारी देने की बात कह गए थे, वह पूरी हो गई।
मैं होता तो ज्यादा अंतर से जीतता

सर्किट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में संतोष गंगवार ने कहा भी कि वह अब सिर्फ भाजपा के नहीं रहे। चुनाव में पार्टी की स्थिति की टीस भी संतोष गंगवार के अंदर नजर आई। बोले, मैं होता तो अंतर ज्यादा होता। पार्टी में दुरभि संधि की मानसिकता वाले लोग नहीं होते तो पार्टी और बेहतर प्रदर्शन करती। पार्टी की इस स्थिति का असर लंबे समय तक रहेगा।

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