बरेली: कलराज मिश्र और फागू चौहान का कार्यकाल पूरा होने के बाद आया 'संतोष गंगवार' का नाम
बरेली, अमृत विचार। यूपी की पृष्ठभूमि के दो राज्यपालों का कार्यकाल पूरा होने से भी संतोष गंगवार की राज्यपाल बनने की राह आसान हुई। लोकसभा चुनाव में टिकट कटने के बाद जिस तरह कलराज मिश्र को मध्यप्रदेश का राज्यपाल बनाया गया था, उसी तरह संतोष गंगवार को भी यह पद मिला है।
मेघालय के राज्यपाल फागू चौहान और राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र का कार्यकाल पूरा हो चुका है। इसके बाद यूपी के किसी नए चेहरे को राज्यपाल बनाने के बारे में सोचा गया तो संतोष गंगवार का कद दूसरे नामों पर भारी पड़ा। इससे पहले मनोज सिन्हा को गाजीपुर सीट से चुनाव हारने के बाद जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल बनाया गया था। यूपी में ही जन्मे ब्रिगेडियर डॉ. बीडी मिश्रा को भी पहले अरुणाचल का राज्यपाल और फिर लद्दाख का उपराज्यपाल बनाया गया।
बरेली के गोपाल स्वरूप पाठक भी रहे थे राज्यपाल और उपराष्ट्रपति
शहर निवासी गोपाल स्वरूप पाठक भी 13 मई 1967 से 31 अगस्त 1969 तक कर्नाटक के राज्यपाल रहे थे। इसके बाद 31 अगस्त 1969 से 1974 तक देश के चौथे उपराष्ट्रपति रहे। करीब 57 साल बाद एक बार फिर बरेली के किसी राजनेता को राज्यपाल बनाया गया है। बरेली में 26 फरवरी 1896 को जन्मे गोपाल स्वरूप पाठक मैसूर, बेंगलुरु और कर्नाटक विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। इसके बाद 3 अप्रैल 1960 से 2 अप्रैल 1966 और 3 अप्रैल 1966 से 13 मई 1967 तक राज्यसभा सदस्य चुने गए। 1966 से 1967 तक केंद्रीय विधि मंत्री रहे।
चार दशकों के बेदाग राजनीतिक जीवन ने आसान की राज्यपाल बनने की राह
करीब चार दशक के बेदाग राजनीतिक जीवन ने संतोष गंगवार की राज्यपाल बनने की राह आसान की। पहली नवंबर 1948 को बरेली में जन्मे संतोष गंगवार ने आगरा विश्वविद्यालय और रुहिलखंड विश्वविद्यालय से बीएससी और एलएलबी की डिग्री ली है। आपातकाल के दौरान सरकार के खिलाफ आंदोलन की अगुवाई पर उन्हें जेल भेजा गया था।
पहली बार 1989 में वह बरेली के सांसद बने। इसके बाद 2019 तक सिर्फ एक बार चुनाव हारे। इस बीच वह उप्र राज्य भाजपा कार्यसमिति के सदस्य भी रहे और 1996 में उप्र भाजपा इकाई का महासचिव पद भी संभाला। संतोष गंगवार अपने संसदीय जीवन में कई मंत्रालयों में मंत्री रह चुके हैं। लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक भी रह चुके हैं। 2009 में वह पीएसी लोक लेखा समिति के अध्यक्ष भी थे।
ये भी पढ़ें- बरेली: फिर याद आई पुरानी कहानी...मरी खाल से तो लोहा भी भस्म हो जाता है, 'मैं तो जिंदा हूं'
