Prayagraj News : उपहार विलेख के शून्य और अमान्य घोषित होने पर भी तय कोर्ट फीस देय

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उपहार विलेख के मामले में देय कोर्ट फीस के नियम को स्पष्ट करते हुए कहा कि एक ऐसे मुकदमे, जिसमें एक उपहार विलेख को शून्य, अमान्य, जाली और मनगढ़ंत घोषित करने के लिए राहत का दावा किया गया है, जो न्यायालय शुल्क अधिनियम, 1870 की धारा 7 (iv-ए) के अनुसार देय होगा, न कि अधिनियम की अनुसूची II के अवशिष्ट अनुच्छेद 17 (iii) के अनुसार दिया जाएगा। अनुसूची II का अवशिष्ट अनुच्छेद 17 (iii) उन मामलों पर लागू होता है, जहां किसी परिणामी राहत का दावा किए बिना घोषणात्मक डिक्री प्राप्त करने की मांग की जाती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर कोई वाद 1870 के अधिनियम के किसी अन्य प्रावधान के अंतर्गत आता है, तो उपरोक्त अवशिष्ट खंड लागू नहीं होगा। दूसरी ओर उक्त अधिनियम की धारा 7(iv-ए) धन या ऐसे मूल्य की अन्य संपत्ति को सुरक्षित करने वाले किसी लिखत के लिए जारी डिक्री को रद्द करने या अमान्य घोषित करने से संबंधित मुकदमों पर लागू होती है। अधिनियम की धारा 6(4) के तहत मूल्यांकन और न्यायालय शुल्क में कमी पर आपत्ति उठाने का वैधानिक अधिकार है। कोर्ट मूलतः कनीज फातिमा द्वारा अधिनियम की धारा 6-ए के तहत दाखिल प्रथम अपील पर सुनवाई कर रहा थी, जिसमें उन्होंने सिविल जज, गोरखपुर के आदेश को चुनौती दी थी , आक्षेपित आदेश में उनसे उपहार विलेख को शून्य घोषित करने के लिए दाखिल मुकदमे में यथामूल्य न्यायालय शुल्क (संपत्ति के बाजार मूल्य के आधार पर) का भुगतान करने की मांग की गई थी , जिसे उनके द्वारा धोखाधड़ी से निष्पादित किया गया था।

कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि निचली अदालत ने अधिनियम की धारा 7(iv-ए) को गलत तरीके से लागू किया है , जो केवल एक दस्तावेज को रद्द करने पर लागू होता है, जो वर्तमान मामले में लागू नहीं होगा। अंत में कोर्ट ने पाया कि चूंकि अपीलकर्ता ने उपहार विलेख को शून्य और अमान्य घोषित करने के लिए राहत का दावा किया था, इसलिए न्यायालय शुल्क अधिनियम,1870 की धारा 7 (iv-ए) के अनुसार देय होगा और अनुसूची II का अवशिष्ट अनुच्छेद 17 (iii) इस मामले में लागू नहीं होगा। उक्त आदेश न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की एकलपीठ ने सिविल जज (वरिष्ठ प्रभाग), गोरखपुर के आदेश को बरकरार रखते हुए कनीज फातिमा की प्रथम अपील खारिज कर पारित किया।

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