रियलिटी चेक: आधार कार्ड न होने से रैन बसेरे में नहीं मिली पनाह, सड़कों पर सोने को मजबूर आश्रय विहीन

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Edited By Amrit Vichar
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बाराबंकी, अमृत विचार। रात में कड़ाके की ठंड पड़ने लगी है। सर्दी के चलते लोगों ने घरों में हीटर, आग और गर्म कपड़ों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। लेकिन इसी कड़ाके की सर्दी में शहर की सड़कों पर कई निराश्रित खुले आसमान के नीचे सोते मिल जाएंगे। हाड़कंपाती देर रात की सर्दी में सड़कों पर सोने वाले यह गरीब और निराश्रित रैन बसेरों की व्यवस्थाओं की पोल खोल रहे हैं। इनका गुनाह सिर्फ इतना है कि इनके पास आधार कार्ड या कोई और आईडी नहीं है। 

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शुक्रवार की देर रात अमृत विचार टीम के रियलिटी चेक में तमाम लोग खुले आसमान के नीचे सोते मिले। नगर पालिका के अस्थायी रैन बसेरों में इन बेसहारा, असहाय, गरीब और जरूरतमंद लोगों को जगह नहीं मिल पा रही है। वैसे तो शहर में आश्रय विहीन लोगों के रहने के लिए लाखों की लागत से रैन बसेरों का निर्माण करवाया गया है। सोच और मकसद यही है कि जरूरतमंद, मुसाफिर और गरीब लोगों को सर्दी में खुले आसमान के नीचे न सोना पड़े। लेकिन फिर भी जरूरतमंद गरीब लोग खुले आसमान में सड़कों पर सोने को मजबूर हैं। 

शहर के पटेल तिराहे के पास स्थित जमुरिया नाले पुल के ठीक किनारे कुछ लोग शुक्रवार देर रात सड़कों पर पेपर और पतली सी चादर का बिछौना बनाए सोते नजर आए। जबकि यहां से कुछ दूरी पर ही नगर पालिका के द्वारा अस्थाई रैन बसेरे का निर्माण किया गया है। इसके अलावा छाया चौहारा, रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप, धनोखर तौराहा, पल्हरी चौराहा और सतरिख नाके पर भी कई लोग खुले आसमान में सोते मिले।

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इतनी ठंड में सड़कों पर सोए इन लोगों को देखकर किसी का भी दिल पसीज जाए लेकिन शायद रैन बसेरों के जिम्मेदारों का दिल नहीं पसीज रहा। इन लोगों से जब पूछा गया कि वो खुले आसमान में क्यों सो रहे हैं, तो उनके जवाब ने रैन बसेरों की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़ा कर दिया। 

इन लोगों ने बताया कि उनका घर नहीं है। आधार कार्ड नहीं होने से उन्हें रैन बसेरे में घुसने नहीं दिया गया। फिर वे फिर वापस नहीं गए। वह मजदूरी करते हैं और रात को यहीं पर सो जाते हैं। रोज यहीं रात गुजारते हैं। व्यवस्था से परेशान इनमें से एक बुजुर्ग ने कहा कि आधी से ज्यादा जिंदगी सड़क पर निकल गई है। बाकी की भी निकल जाएगी।

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वहीं जब अमृत विचार की टीम पटेल तिराहे पर स्थित रैन बसेरे पर पहुंची और बंद गेट खटखटाया तो केयर टेकर ने दरवाजा खोला। 15 बेड के रैन बसेरे में चार लोग ही सो रहे थे। बाकी बेड खाली पड़े थे। हालांकि रैन बसेरे में रजाई और गद्दे के पूरे इंतजाम दिखे। केयर टेकर शिव प्रसाद यादव ने बताया कि रैन बसेरे में रुकने के लिए आईडी जरुरी है। हालांकि शिव प्रसाद ने बताया कि अगर किसी के पास आइडी नहीं हो तब भी वह उन्हें जाने के लिए नहीं कहते। 

हालांकि प्रशासन की तरफ से भी रैन बसेरों का समय-समय पर निरीक्षण करने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन सड़क पर सोते इन गरीबों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा। इन्हें देखने वाला कोई नहीं है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि खुले आसमान के नीचे सो रहे लोगों की जान पर अगर इस ठंड के चलते बन आई तो उसका जिम्मेदार कौन होगा।

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सुरक्षा के लिहाज से आईडी मांगी जाती है। लेकिन रैन बसेरों में किसी भी जरूरतमंद को लेटने से नहीं रोका जाता। जो लोग खुले आसमान के नीचे सो रहे हैं, उन्हें टीम द्वारा चिन्हित कराकर रैन बसेरों में भिजवाया जाएगा... संजय शुक्ला, ईओ, नगर पालिका नवाबगंज।

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