नीतीश के सबक
बिहार में जदयू के नंबर तीन की पार्टी बनने के बाद भी उसके मुखिया नीतीश राजग के नेता बनकर मुख्यमंत्री बन गए हैं। उन्होंने शपथ भी ले ली लेकिन एक बार फिर से उनका राज्य की सत्ता के शीर्ष पर बैठना उनके लिए ही बड़ा सबक है, इसलिए क्योंकि बिहार की जनता ने उनको इस …
बिहार में जदयू के नंबर तीन की पार्टी बनने के बाद भी उसके मुखिया नीतीश राजग के नेता बनकर मुख्यमंत्री बन गए हैं। उन्होंने शपथ भी ले ली लेकिन एक बार फिर से उनका राज्य की सत्ता के शीर्ष पर बैठना उनके लिए ही बड़ा सबक है, इसलिए क्योंकि बिहार की जनता ने उनको इस विधानसभा चुनाव में एक तरह से नकार दिया। मुख्यमंत्री के तौर पर अगर वह जनता की पसंद होते तो 115 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद जदयू को महज 43 सीटों पर ही न पटका गया होता।
जदयू के लिए पिछले विधानसभा चुनाव से इस बार 28 सीटें कम मिलीं। 2005 के विधानसभा चुनाव में उसको 71 सीटें हासिल हुई थीं। इसके बाद भी गठबंधन धर्म निभाते हुए भाजपा ने खुद को जदयू से दोगुनी से 12 कम यानी 74 सीटें मिलने के बाद भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया है।
नीतीश कुमार कभी बिहार के सुशासन बाबू कहे जाते थे। यही वजह थी कि वहां की जनता ने उनको कई बार मुख्यमंत्री बनवाया लेकिन पिछले कार्यकाल में उनकी छवि सुशासन बाबू से अक्षम मुख्यमंत्री के तौर पर होने लगी थी। राज्य में रोजगार की कमी, 2019 में बाढ़ प्रबंधन को लेकर राज्य सरकार की नाकामी, स्कूलों में बेपटरी शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर नीतीश सरकार घिरने लगी। रही-सही कसर कोरोना महामारी में बिहार राज्य के प्रवासी लोगों के सामने खड़ी हुईं मुश्किलों में कोई राहत न दे पाने ने पूरी कर दी। इस पर नीतीश कुमार की काफी किरकिरी हुई। उनसे बिहार की जनता इतनी नाराज हो गई कि इस विधानसभा चुनाव में उन्हें सबक सिखाने की ठान ली थी। जदयू की सीटें घटना इसी का नतीजा है।
सही बात यह है कि बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के मुकाबले मुख्यमंत्री के रूप में राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव को ज्यादा पसंद किया। 75 सीटें देकर राजद का नंबर एक पार्टी बनना इसका ही नतीजा है। यह बात दीगर है कि राजग के मुकाबले महागठबंधन को बहुमत न मिलने से जनमत के विपरीत नीतीश की किस्मत फिर खुल गई और ऐसा किया है भाजपा ने, जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। रणनीतिक तौर पर वह अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री बनवाने की कोशिश कर सकती थी लेकिन सैद्धांतिक तौर पर उसने नीतीश को ही यह मौका दिया है।
अब जब एक बार फिर से नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश के बाद देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य की सत्ता के प्रमुख फिर बन गए हैं तो उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वह मंथन करें कि जनता की उनसे अपेक्षाएं क्या थीं और उन पर वे क्यों विफल साबित हुए? सवाल यह भी अहम है कि क्या नीतीश फिर से सुशासन बाबू की अपनी पुरानी छवि को बहाल कर पाएंगे?
