बरेली: दो दिन की मंजू को फेंक दिया था अपनों ने, जिंदगी बदल दी सपनों ने
रजनेश सक्सेना, बरेली। न ममता का आंचल मिला और न पिता की गोद नसीब हुई। अपनों के होते हुए भी उसकी जिंदगी अनाथालय में गुजरी। महज दो दिन की उम्र में ही अपनों ने उससे मुंह मोड़ लिया था। बीच सड़क पर रोती-बिलखती मासूम को देख एक बेगाने का दिल पसीज गया और उसने मासूम …
रजनेश सक्सेना, बरेली। न ममता का आंचल मिला और न पिता की गोद नसीब हुई। अपनों के होते हुए भी उसकी जिंदगी अनाथालय में गुजरी। महज दो दिन की उम्र में ही अपनों ने उससे मुंह मोड़ लिया था। बीच सड़क पर रोती-बिलखती मासूम को देख एक बेगाने का दिल पसीज गया और उसने मासूम बच्ची को अनाथालय पहुंचा दिया। बस यहीं से उसकी जिंदगी का नया सफर शुरू हुआ। अनाथालय ही उसका सहारा बना और हौसले से उसने खुद अपनी तकदीर की इबारत लिखनी शुरू कर दी। वह सेना में जाकर देश सेवा करना चाहती थी लेकिन शारीरिक दक्षता आड़े आ गई। इसके बाद भी उसने अपने सपने को नहीं छोड़ा। नर्सिंग में दाखिला लिया और अब इसी के रास्ते सेना में जाने का सपना साकार करने का प्रयास कर रही है। यह कहानी है अनाथालय में पली-बढ़ी एसआरएमएस मेडिकल कालेज की नर्सिंग छात्रा मंजू पाल की।
मंजू बताती हैं, ‘मुझे तो अपनों ने उस वक्त सड़क पर फेंक दिया था जब मैं सिर्फ दो दिन की थी। मैंने अपने मां-बाप को नहीं देखा, शायद इसलिए मुझे कभी उनकी कमी महसूस नहीं हुई। अनाथालय के लोग ही मेरा परिवार हैं। यहां मैं अकेली लावारिस नहीं बल्कि सब मेरी ही तरह हैं। हम सभी एक-दूसरे का सहारा हैं।’
मंजू नर्सिंग की पढ़ाई कर रही हैं। इस क्षेत्र को चुनने की क्या खास वजह रही? पूछने पर कहती हैं, ‘मैं सेना का हिस्सा बनना चाहती थी लेकिन मेरी कम हाईट की वजह से यह संभव नहीं हो सका। इसलिए मैंने मेडिकल लाइन को चुना। मैं अब नर्सिंग के जरिये सेना में जाने का अपना सपना पूरा करना चाहती हूं।’
सपनों की राहें आसान नहीं होतीं। मंजू का सफर कैसा रहा? पूछने पर कहती हैं, ‘मुझे बचपन से ही पढ़ने का शौक था। मैंने 77 प्रतिशत अंकों के साथ हाईस्कूल पास किया और फिर हाथरस के सासनी गुरुकुल से 75 प्रतिशत अंकों के साथ 12वीं पास की। इसके बाद अनाथालय की ओर से मेरा दाखिला एसआरएमएस में करा दिया गया। नर्सिंग में मेरा यह दूसरा साल है। अब मन लगाकर पढ़ती हूं ताकि अपने सपने को पूरा कर सकूं और समाज के लिए कुछ कर सकूं।’
…और मंजू से हो गई मंजू पाल
मंजू के संघर्ष का सफर 18 वर्ष पहले शुरू हुआ था। वर्ष 2002 में जब वह महज दो दिन की थी तो महेश पाल नाम का एक शख्स उसे आर्य समाज अनाथालय लेकर आया था। मंजू उसे सड़क पर पड़ी मिली थी। कहां मिली थी, यह नहीं बताया। अनाथालय के प्रधान हर्षवर्धन बताते हैं, ‘अनाथालय की वार्डन ने दो दिन की उस मासूम बच्ची को मंजू नाम दिया था। मंजू जब बड़ी हुई तो उसे बताया गया कि महेश पाल नाम का एक व्यक्ति उसे यहां लाया था। तब से मंजू ने अपने नाम के साथ पाल लिखना शुरू कर दिया।’
पहले नौकरी देगा संस्थान, फिर वेतन से काटेगा फीस के पैसे
अनाथालय के प्रधान हर्षवर्धन ने बताया कि जब मंजू ने मेडिकल में भविष्य बनाने की बात कही तो अनाथालय का पैनल एसआरएमएस ट्रस्ट के अध्यक्ष देवमूर्ति से मिला। उन्होंने देवमूर्ति से कहा कि अनाथालय की बच्ची नर्सिंग में दाखिला लेना चाहती है। कॉलेज में नर्सिंग की फीस दो लाख 80 हजार रुपये थी। जब पैनल ने फीस अदा कर पाने में असमर्थता जताई तो 15 हजार रुपये में मंजू के दाखिले की बात तय हुई। साथ ही कोर्स समाप्त होने के बाद मंजू को नौकरी देने का वादा भी संस्थान ने किया। इसके लिए देवमूर्ति ने एक शर्त रखी कि जब तक मंजू की पढ़ाई का पूरा पैसा वह नहीं ले लेते तब तक उसके वेतन से 5 हजार रुपये प्रतिमाह काटे जाएंगे। इस बात पर सभी तैयार भी हो गए और मंजू को दाखिला मिल गया।
