अब यह लाइलाज व जानलेवा बीमारी आएगी काबू में... कानपुर के GSVM में काइमरिक सेल थेरेपी से होगा इलाज

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

विकास कुमार, कानपुर। बच्चों में होने वाली जानलेवा बीमारी ‘ड्यूचेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ का काइमरिक सेल थेरेपी से बेहतर उपचार मिलने की उम्मीद बलवती हुई है। बच्चों में होने वाली इस सर्वाधिक गंभीर बीमारी में शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं। इससे बच्चे न केवल चलने-फिरने में असमर्थ हो जाते हैं, बल्कि 99 फीसदी मामलों में मौत हो जाती है।

अभी इस लाइलाज बीमारी में मरीज के बोन मैरो को निकालकर उसमें स्टेम सेल बनाकर फिर से मरीज में डाला जाता है। इस उपचार से मरीजों में 70 फीसदी तक फायदा देखा गया है, लेकिन शोध व अनुसंधान से पता चला है कि माता-पिता या भाई-बहन की मांसपेशियों से टिश्यू निकालकर काइमरिक यानि संयुक्त सेल थेरेपी के जरिए मरीज के क्षतिग्रस्त टिश्यू को सही करके बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। 

डयूचेन मस्कूलर डिस्ट्रॉफी जन्मजात बीमारी है। लेकिन इसका पता तब चलता है, जब बच्चा दो से तीन साल में चलने लायक होने के बावजूद खड़ा नहीं हो पाता है और गिर जाता है। इसकी वजह उसके पैरों में ताकत नहीं होना होता है। इस बीमारी से पीड़ित ज्यादातर बच्चे 13 से 25 वर्ष की आयु के बीच हार्ट या फेफड़े फेल हो जाने से दम तोड़ देते हैं। माता-पिता उन्हें तिल-तिल मरते देखने को मजबूर रहते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक दुनिया में औसतन हर 3600 में एक बच्चा ड्यूचेन मस्कूलर डिस्ट्रॉफी पीड़ित है। 

अमेरिका के बाद भारत में शुरू होगा उपचार 

इस आनुवांशिक रोग का अमेरिका के बाद अब देश के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में उपचार शुरू होगा। मेडिकल कॉलेज में रिजनरेटिव मेडिसिन एंड सेल्युलर थेरेपी विभाग के विजिटिंग प्रोफेसर व ऑथोपेडिक्स डॉ.बीएस राजपूत ने बताया कि माइक्रो डिस्ट्रॉफी जीन (काइमरिक सेल थेरेपी) की मदद से ड्यूचेन मस्कूलर डिस्ट्रॉफी ग्रस्त बच्चों के शरीर में प्रोटीन डाला जाएगा। काइमरिक सेल बनाने के लिए पीड़ित बच्चे और उसके पिता या भाई-बहन के मांसपेशियों से बायोप्सी के जरिए सेल लिए जाएंगे। इसके बाद दोनों के स्टेम सेल के साथ कल्चर कर काइमरिक सेल बनाकर पीड़ित बच्चे में डाले जाएंगे। परीक्षण उपचार शुरू करने के लिए एथिकल कमेटी की मंजूरी का इंतजार है।  

25 करोड़ खर्च वाली जीन थेरेपी का बनेगी विकल्प  

काइमरिक सेल प्रक्रिया जीन थेरेपी के विकल्प के रूप में काम करेगी। जीन थेरेपी पर करीब 25 करोड़ रुपये खर्च आता है। इसके मुकाबले लैब में सेल कल्चर पर 15 से 20 लाख ही खर्च आएगा। मुंबई की दो लैब स्टेम सेल कल्चर से काइमरिक सेल तैयार करती हैं। इस थेरेपी में किसी प्रकार के दुष्प्रभाव का खतरा भी नहीं है। 

आनुवांशिक रोगों पर भी करेगी थेरेपी 

जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि देश में पहली बार स्टेम सेल थेरेपी के बाद अब काइमरिक सेल थेरेपी शुरू की जा रही है। इससे आनुवांशिक रोगों का भी इलाज किया जा सकेगा। यह थेरेपी न्यूरो मस्कुलर डिसआर्डर, स्पाइन मस्कुलर डिसऑर्डर, लिंब गर्डल मस्कुलर डिसऑर्डर, मोटर न्यूरॉन डिजीज जैसे रोगों में भी दी जाएगी। इस थेरेपी में खास तरह के प्रोटीन का निर्माण किया जाता है, जिससे पीड़ित के शरीर में प्रोटीन की कमी दूर होने से बीमारी नियंत्रण में आती है और मरीज में सुधार आने लगता है।

संबंधित समाचार