बरेली: 25 सौ रुपये में पहला एमएलसी चुनाव जीते थे ‘विकट’
विश्वदीपक त्रिपाठी, बरेली। हमने कभी गाड़ी, बंगला का मोह नहीं किया। बरेली-मुरादाबाद मंडल के शिक्षक विधान परिषद का सदस्य रहते हुए भी पैदल और रिक्शा से कालेज जाता था। कक्षा में पढ़ाता और सदन चलने पर शिक्षक हितों के लिए आवाज उठाता था। पहले तो कोई भी राजनीतिक दल प्रत्याशी नहीं उतारता था। केवल शिक्षक …
विश्वदीपक त्रिपाठी, बरेली। हमने कभी गाड़ी, बंगला का मोह नहीं किया। बरेली-मुरादाबाद मंडल के शिक्षक विधान परिषद का सदस्य रहते हुए भी पैदल और रिक्शा से कालेज जाता था। कक्षा में पढ़ाता और सदन चलने पर शिक्षक हितों के लिए आवाज उठाता था। पहले तो कोई भी राजनीतिक दल प्रत्याशी नहीं उतारता था।
केवल शिक्षक संघ के गुटों के प्रत्याशी मैदान में होते थे लेकिन अब तो शिक्षक विधान परिषद सदस्य का राजनीतिकरण हो गया है। ये बातें 1972 से 1984 तक दो बार एमएलसी रहे रमेश चंद्र शर्मा ‘विकट’ ने दैनिक ‘अमृत विचार’ से बुधवार को खास बातचीत में कहीं। उन्होंने वर्तमान शिक्षक एमएलसी चुनाव के प्रचार-प्रसार और अन्य तौर-तरीकों पर अपनी बात रखी।
मूल रूप से बदायूं के रहने वाले 84 वर्ष के रमेश चंद्र शर्मा ‘विकट’ शहर के सुभाष नगर इलाके में अभी भी किराये के मकान में रहते हैं। शहर के श्री गुरुनानक खालसा इंटर कॉलेज में वर्ष 1960 में शिक्षक बने और लंबे समय तक प्रधानाचार्य रहने के बाद 1998 में सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने बताया कि शिक्षक आंदोलन को लेकर प्रदेश के विभिन्न जनपदों के अलावा बिहार, बंगाल, सिक्किम आदि जगहों पर भी जा चुके हैं।
शिक्षकों के आंदोलन से गहरा नाता होने कारण जेल भी जा चुके हैं। शर्मा गुट गठन के बाद वह पहली बार 1972 में शिक्षक एमएलसी का चुनाव जीते थे। इसके बाद 1978 में फिर से चुनाव जीत गए थे। तब बरेली-मुरादाबाद खंड निर्वाचन में नौ जनपद ही हुआ करते थे। इनमें सीतापुर, लखीमपुर, हरदोई, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद शामिल थे। उन दिनों उनके सियासी प्रतिद्वंदी रामरस पाल शुक्ल, चंद्रमोहन द्विवेदी और पूर्व एमएलसी जेपी अग्रवाल हुआ करते थे।
उन्होंने कहा कि 6 से 7 हजार वोटर होते थे। पहली बार चुनाव में महज 25 सौ रुपये खर्च हुए थे। शिक्षक वोटरों के पास डाक के माध्यम से पत्र भेजकर वोट अपने पक्ष में देने की गुहार लगाते थे। दोनों चुनाव में प्रथम वरीयता के मतों से जीत हासिल हुई थी। विधान परिषद सदस्य होने के कारण 750 रुपये वेतन के तौर पर मिलता था। शिक्षक एमएलसी के चुनाव में शर्मा और पांडेय गुट का वर्चस्व हुआ करता था। कोई तीसरा इस सीट पर प्रत्याशी खड़ा करने की हिम्मत नहीं जुटाता था। इसके कारण विधान परिषद में सरकार से शिक्षकों के हितों के लिए कई बार नोकझोंक की स्थिति आ जाती थी। अब तो पूरा राजनीतिक परिवेश ही बदल चुका है। दो बार आश्वासन समिति का चेयरमैन भी रहा।
लालच से नहीं कराएंगे ट्रांसफर
रमेश चंद्र शर्मा बताते हैं, ‘एक बार की बात है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के पास एक अभियंता का ट्रांसफर कराने के लिए गया तो मुख्यमंत्री ने तुरंत आदेश कर दिया। इस पर मौजूद अन्य विधायकों ने कहा कि इनका काम तो आपने तुरंत कर दिया, हम सभी के कार्य में देरी होती है। इस पर बड़े सहज भाव में वीर बहादुर सिंह ने कहा कि शिक्षक एमएलसी हैं, इनके पास सही सिफारिश आती है, यह किसी का ट्रांसफर लालच या बेवजह नहीं कराएंगे। पहले शिक्षक एमएलसी की यही पहचान होती थी। लेखन में गहरी रुचि रखने वाले रमेश चंद्र शर्मा ने कई किताबें भी लिखी हैं।’
